उमड़ते बादल, बहता पानी,
किसने इनकी महिमा जानी।
बादल झूम-झूम कर बरसे,
जब धरती पानी को तरसे,
खेतों में फसलें लहलहायें,
पशु पक्षी सब फिर जी जाएँ,
धरा पे दौड़ जाए ख़ुशी की लहर,
जैसे जी उठी हो ज़िंदगी जो गयी थी ठहर,
पक्षी करें कलरव, नाचें मोर,
हृदय हों पुलकित भाव-विभोर,
मेघ जब हैं अमृत की वर्षा करते,
चले बयार, जलाशय भरते,
ईश्वर की जब यूँ हो कृपा अपार,
धन्य हो जाता सारा संसार।
बहता पानी है रमता जोगी,
मुक्त चले वह, न वह भोगी,
बहा ले जाए पाप और मल,
बहे अविरल, न रुके एक पल,
बहता जल है जीवन रेखा,
किसने ऐसा जीवन दायक देखा,
अवरोधों को लांघता, बढ़े सागर की ओर,
जहां मिले अनंत से जिसका न कोई छोर।
उमड़ते बादल, बहता पानी,
जिसने इनकी महिमा जानी,
प्रकांड पंडित वह परम-ज्ञानी!
अरुण भगत
#arunbhagatwrites#poetry# poeticoutpourings#outpouringsof myheart#writer#Indianwriter#englishpoetry#hindipoetry#poetryofthesoul