उमड़ते बादल, बहता पानी

उमड़ते बादल, बहता पानी,

किसने इनकी महिमा जानी।

बादल झूम-झूम कर बरसे,

जब धरती पानी को तरसे,

खेतों में फसलें लहलहायें,

पशु पक्षी सब फिर जी जाएँ,

धरा पे दौड़ जाए ख़ुशी की लहर,

जैसे जी उठी हो ज़िंदगी जो गयी थी ठहर,

पक्षी करें कलरव, नाचें मोर,

हृदय हों पुलकित भाव-विभोर,

मेघ जब हैं अमृत की वर्षा करते,

चले बयार, जलाशय भरते,

ईश्वर की जब यूँ हो कृपा अपार,

धन्य हो जाता सारा संसार।

बहता पानी है रमता जोगी,

मुक्त चले वह, न वह भोगी,

बहा ले जाए पाप और मल,

बहे अविरल, न रुके एक पल,

बहता जल है जीवन रेखा,

किसने ऐसा जीवन दायक देखा,

अवरोधों को लांघता, बढ़े सागर की ओर,

जहां मिले अनंत से जिसका न कोई छोर।

उमड़ते बादल, बहता पानी,

जिसने इनकी महिमा जानी,

प्रकांड पंडित वह परम-ज्ञानी!

अरुण भगत

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तभी बनेगा जीवन-योद्धा

चल चला चल, चल चला चल,

रुक न तू एक पल।

समय की धारा की भाँति बहता जा,

सब कुछ सुनता और सहता जा,

कुछ नयी सीख ले हर पल से,

प्रेम से सब को जीत,

तू गा ख़ुशी के गीत,

क्या जीता जो जीता बल से।

आशाओं की ओढ़नी ओढ़,

हर बेड़ी को तोड़,

तू उन्मुक्त पवन सा बह जा,

जो मन के उद्गार सो कह जा।

कल की कौन है जाने,

वक़्त बुने क्या ताने-बाने,

इस पल में है जीवन का सार,

जोड़ ले इससे मन की तार।

उल्लास से जी, न कभी स्वयं से हार,

तेरी उज्जवल सोच ही तेरा करेगी बेड़ा पार,

देख, नए क्षितिज जोहते तेरी बाट,

तुम्हें बुलाता समय सरिता का मोहक घाट,

दृढ़ निश्चय कर बढ़ जा आगे,

जोड़ जो टूट गए हैं धागे,

जीवन अमृत का कर ले तू रस-पान,

तभी बनेगा जीवन-योद्धा, कहलाएगा गुणों की खान!

अरुण भगत

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न जाने कहाँ थमेगी…

कहाँ गया वो सब अमन चैन,

जब दिन थे ख़ुशनुमा और सकूँ भरी थी रैन,

जब बादल बरसते थे दिल खोल कर,

जब हर बात न करनी पड़ती थी तोल कर,

जब मोर की तरह पंख खोले था दिल नाचता,

जब दिल का दिल से था क़ायम पूरा राब्ता,

तब मानो पंख लगाकर उड़ जाते थे दिन,

रह नहीं पाता था भाई भाई के बिन,

जब घरों के दरवाज़े सबके लिए होते थे खुले,

जब रह नहीं पाते थे एक दूसरे को बिना मिले जुले,

जब सुरीले होते थे गीत और होते थे मीठे सपने,

न होता था कोई ग़ैर, सब होते थे अपने,

तब बिन पैसों के भी थे सब धनी,

हर रिश्ते में लगता था जैसे मिल गयी हो कोई मणि,

ख़ुदगर्ज़ी के इस दौर में काफ़ूर हो गया जीने का मज़ा,

हर दिन लगे है बोझ और रात एक लम्बी सज़ा,

सही और ग़लत में है मिट गया सब फ़र्क़,

लालच के इस दौर में किरदार हो गया ग़र्क़,

न जाने कहाँ जा थमेगी यह अंधी दौड़,

जब लगी है हर तरफ़ गिरने-गिराने की होड़!

अरुण भगत

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ज़िंदगी की अधूरी कहानी

प्रतिदिन सपने लेते आकार,

उनमें से कुछ ही होते साकार,

बहुत से समय की गर्त में जाते खो

जैसे बुझ जाए जलती हुई कोई लौ,

पर होते हैं कुछ ऐसे अपूर्ण सपने

जो लगें हमें बहुत अपने,

वे रह जाते बन कर एक टीस मन में

जैसे चुभता हो कोई शूल तन में,

ज़िंदगी में चाहे कितनी भी तय कर लें दूरी,

कहाँ होती हैं सब इच्छाएँ, सब ख्वाहिशें पूरी,

कौन नहीं चाहता बादलों पर तैरते चाँद को पकड़ना,

कौन नहीं चाहता हाथों से जाती हर ख़ुशी को बाहों में जकड़ना,

पर कब कहाँ हो पाता है यह सब,

कहाँ सौंपता है हमारे हाथों में जगमगाते सितारे यह नभ ?

कितने भी मारे हाथ पैर , कितने भी कर लें यतन ,

यूँ ही ज़िंदगी की अधूरी कहानी एक दिन हो जाती खतम !

अरुण भगत

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कहाँ लुप्त हो गए…

कहाँ लुप्त हुए वो अमन चैन के दिन,

जब जीवन की न कर सकते थे परिकल्पना प्रेम बिन,

जब जीवन लगता था सारगर्भित,

जब सनेह के पुष्प होते थे पल्लवित,

जब मन में उठती थी उल्लास की तरंग

मानो आकाश में झूमती नाचती मस्त कोई पतंग,

सादा जीवन, प्रगाढ़ सम्बंध, सुंदर गीत,

बिना जीत के भी लगती थी तब अपनी जीत,

प्रकृति से अटूट नाता, सघन वन, नदियों का निर्मल जल,

भीतर बाहर न कोई कपट, द्वेष, न मल,

समय का वेग उस जीवन को ले गया कहाँ बहा,

सम्पन्न होते हुए भी लगे जैसे हाथ में कुछ नहीं रहा,

अभूतपूर्व प्रगति के इस दौर में मन क्यों जाता है बार बार डूब,

हृदय क्यों हो गए बंजर भूमि, क्यों हम जाते जल्दी ऊब,

क्यों लगता सब रीता-रीता, एक दूसरे से हो गए मीलों दूर,

ऊसर मरू भूमि सा हो गया जीवन जो हर्ष और आनंद से था भरपूर,

कहाँ ले आया हमें समय का रेला,

अजब सा इसने खेल है खेला,

निरुत्साहित निस्तेज हम जिसमें भटकें,

यह इस युग का है कैसा मेला?

अरुण भगत

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सब कुछ ख़ुदा पे छोड़ दे

मन में यह मलाल क्यों,

चेहरे पे ये सवाल क्यों,

कहाँ मिलेंगे तुझे जवाब,

होता है हलकान क्यों?

जान ले तू यह आज,

यहाँ राज़ में हैं दफ़न राज़,

कहाँ परतों को तू हटाएगा,

इसी तिलस्मी जाल में उलझ जाएगा,

न खड़े कर इतने सवाल,

न बन जा खुद ही अपने जी का जंजाल,

डाल वक़्त के हाथों में हाथ,

बह जा बहते के दरिया के साथ,

ज़िंदगी को इक खूबसूरत मोड़ दे,

सब कुछ ख़ुदा पे छोड़ दे,

कभी वो हंसाएगा, कभी वो रुलाएगा,

पर याद रख, मंज़िल पे वही पहुँचाएगा,

निकल तू बाहर खुद को लेकर हर भरम से,

रख तू पूरा भरोसा उस ख़ुदा के करम पे,

आख़री दम तक उसे ही तू साथ पाएगा,

तेरी डूबती किश्ती को वही पार लगाएगा,

उस की सरपरस्ती में तू बढ़ जा आगे,

उसी के हवाले कर अपनी ज़िंदगी के धागे,

हर उलझी तार को वही सुलझाएगा,

उसी के जलाल से तेरा जहान रौशन हो पाएगा!

अरुण भगत

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स्वयं को करो सिद्ध

चलो उठो, हाथ बढ़ा कर छू लो,

यह विस्तृत गगन तुम्हारा है,

इसी सोच ने बहुतेरों का जीवन संवारा है,

चलो, हो जाओ लहरों पर सवार,

दिखता है दूर जो क्षितिज, वह भी तो तुम्हारा है,

आगे बढ़ने वालों को रुकना कहाँ गवारा है?

चंद्रमा के घोड़े पे सवार बढ़ जाओ तारों की ओर,

कौन जाने कहाँ ले जाए तुम्हें तुम्हारे जीवन की डोर?

मेघ आच्छादित अम्बर में दामिनी की भाँति जाओ कौंध,

सत्य को बल दो और असत्य को दो रौंद,

जीवामृत का पान कर हो जाओ अजर अमर,

विजयी उद्घोषित करे तुम्हें जीवन समर,

शीर्ष हो ऊसर और तेजोमय ललाट हो,

खुल जाएँ तुम्हारे लिए जो भी बंद कपाट हों,

हो सवार असीमित सम्भावनाओं के रथ पर,

स्वयं को करो सिद्ध, बढ़ जाओ श्रेष्ठता के पथ पर!

अरुण भगत

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In Your Heart Lies Your Salvation

Listen to what your heart says,

Candidly luminous are its ways,

It is where your God resides,

Over it all of your goodness presides,

Does it somewhere a bell ring

That of your life your heart is the well-spring?

Your mind can lead you astray

But your heart will always show you the right way,

It is what transmits love to all,

It will never let you into any moral abyss fall,

If the leaders had been led by their heart,

This world would have been spared many an ugly wart,

If love had ruled the roost,

To empathy and compassion it would have given a real boost,

That would have turned this world into a real beautiful place

And it would have been rooted in plentitude of grace!

Arun Bhagat

All rights reserved

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This Culture of High Rises But Low Life

Today’s soulless culture

Nibbles at your soul like a vulture,

It saps your energy

Because its mindlessness with your inner being has no synergy,

With lust as its creed,

It promotes unabashed greed,

Armed with its project of dumbing down your mind,

It is certainly one of its kind,

Your sense you have to pawn

To be a part of the needless consumption it spawns,

This culture of vulgar excess

Has landed us in an ecological mess,

It has made mincemeat of our moral being,

It has so distorted our way of seeing,

The way over our eyes it puts wool,

It makes each one of us a self-obsessed narcissistic fool,

Under its searing impact it has left us so reeling

That we have bid adieu to every worthwhile feeling,

Caught up in its dangerously venal game of dice,

What do we make of this culture of high rises but low life?

Arun Bhagat

All rights reserved

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अजीब सी यह एक पहेली है

ज़िंदगी की क्या ग़ज़ब कहानी है,

कभी सब कुछ जाता थम, कभी लगे रगों में रवानी है,

अजीब सी यह एक पहेली है,

कभी दुश्मन, कभी लगे सहेली है,

कभी बैठाए सिर पर, कभी नीचे पटकती है,

कभी सजे काजल की तरह आँखों में, कभी कंकड़ की तरह अटकती है,

कभी लहलहाते खेतों की तरह, कभी लगे भूमि बंजर,

कभी लगाए मरहम, कभी चुभे जैसे ख़ंजर,

कभी बांधे अपने मोहपाश में, कभी करे मोहभंग,

कभी लगे बेरंग, कभी बिखेरे सुंदर मनमोहक रंग,

ज़िंदगी की बिसात में लगी रहती जीत हार,

कभी छोड़ दे बीच भँवर में, कभी लगाए पार,

कौन इसके मर्म को जान पाया है,

कभी लगे हक़ीक़त, कभी तिलिस्मी साया है,

कौन लगाए हिसाब क्या खोया, क्या पाया है,

राम जी ही जानें यह क्या उनकी अदभुत माया है!

अरुण भगत

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