उमड़ते बादल, बहता पानी

उमड़ते बादल, बहता पानी,

किसने इनकी महिमा जानी।

बादल झूम-झूम कर बरसे,

जब धरती पानी को तरसे,

खेतों में फसलें लहलहायें,

पशु पक्षी सब फिर जी जाएँ,

धरा पे दौड़ जाए ख़ुशी की लहर,

जैसे जी उठी हो ज़िंदगी जो गयी थी ठहर,

पक्षी करें कलरव, नाचें मोर,

हृदय हों पुलकित भाव-विभोर,

मेघ जब हैं अमृत की वर्षा करते,

चले बयार, जलाशय भरते,

ईश्वर की जब यूँ हो कृपा अपार,

धन्य हो जाता सारा संसार।

बहता पानी है रमता जोगी,

मुक्त चले वह, न वह भोगी,

बहा ले जाए पाप और मल,

बहे अविरल, न रुके एक पल,

बहता जल है जीवन रेखा,

किसने ऐसा जीवन दायक देखा,

अवरोधों को लांघता, बढ़े सागर की ओर,

जहां मिले अनंत से जिसका न कोई छोर।

उमड़ते बादल, बहता पानी,

जिसने इनकी महिमा जानी,

प्रकांड पंडित वह परम-ज्ञानी!

अरुण भगत

#arunbhagatwrites#poetry# poeticoutpourings#outpouringsof myheart#writer#Indianwriter#englishpoetry#hindipoetry#poetryofthesoul

Published by Arun Bhagat

I love to talk through my writings.@

16 thoughts on “उमड़ते बादल, बहता पानी”

  1. बहुत सुंदर कविता लगीं हर🙏👌

    Like

  2. अत्यंत सुंदर। जल ही जीवन है और जल के आभाव में मनुष्य जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। हम ईश्वर का जितना भी धन्यवाद करें उतना ही कम है।

    Like

    1. बिलकुल, जोगेश भाई! जल ही जीवन है और जीवन देने वाले की अत्यंत कृपा का सदैव आभास रहना चाहिए।

      Like

  3. अत्यंत सुंदर कविता है सर। मेघा का प्रभाव ही ऐसा होता है की हर जगह खुशियां फैल जाती है और मानव जीवन की जल की पूर्ति भी होती है।

    Like

    1. बिलकुल सही कहा आपने, राशी। आपकी सुंदर प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत धन्यवाद!

      Like

Leave a Reply

Create your own website, free on WordPress.com.Create your own website.
Start free