मौन की है अपनी महिमा

  शब्द जाल से बाहर निकल  मौन का तू महत्व समझ, शब्द हमें हैं उलझाते  शब्द हमें हैं भरमाते, शब्द कोलाहल बढ़ाते  शब्द बाण हमें सताते, मौन की है अपनी महिमा  कर संचित उसकी गरिमा,  मौन में है परम शांति  अद्भुत है मौन की कांति, मौन की महिमा अपरंपार  मौन में समाहित पूर्ण विस्तार,  शब्दContinue reading “मौन की है अपनी महिमा”

नए क्षितिज की ओर बढ़ो

जीवन है नित नया  जो गया सो गया !  बीती बात बिसारिये  अपना आज संवारिये  बीता हाथ न आयेगा  मन का चैन ले जाएगा  जो समय की गर्त में गया समा  कह दो ना उसे अब अलविदा  यूँ ही व्यर्थ न हाथ मलो  नए क्षितिज की ओर बढ़ो  नए अम्बर और नित नई भोर  बढ़ोContinue reading “नए क्षितिज की ओर बढ़ो”

चाय दिवस पर चाय को समर्पित एक कविता

  चाय की भी क्या ग़ज़ब कहानी है  चाय से ही तो रगों में रवानी है !  चाय की है दीवानी सारी दुनिया  बच्चू चाचा हों या फिर हो मुनिया ! चाय है तो हमारी शामें रंगीन हैं  चाय न कोई पूछे तो तौहीन है !  चाय से है यारों की महफ़िल सजती  ख़ुशबू चायContinue reading “चाय दिवस पर चाय को समर्पित एक कविता”

वही कहलाता जीवन योद्धा

मन विकल हो तो उसे ढाँढस बँधाइए  गर्त में निराशा की कभी न जाइए!  पग-पग मुश्किलें रोकेंगी रास्ता  विकराल बाधाओं से पड़ेगा वास्ता,  फ़न फैलाए मिलेंगे विषधारी नाग  चहूँओर होगी झुलसा देने वाली आग,  साहसी  वही धैर्य का जिसके बाँध न टूटे  विषाद-संताप का उसके ज्वालामुखी न फूटे,   उफनती लहरों के बीच जो रहेContinue reading “वही कहलाता जीवन योद्धा”

हम गुज़र जाते हैं

वक्त गुज़र जाता है , इंसान गुज़र जाते हैं  बस हम यूँ ही ठगे-ठगे खड़े रह जाते हैं!  गुज़र जाते हैं दिन, गुज़र जाती हैं रातें  गुज़र जाते हैं वाक़यात, रह जाती हैं बातें !  गुज़र गए पोरस, गुज़र गए सिकंदर  मिट गए जहां से जिन्हें कहते थे धुरंधर !  गुज़र जाती हैं आँधियाँ, गुज़रContinue reading “हम गुज़र जाते हैं”

हमें यह रहस्य कौन समझाये?

ज़िंदगी चला-चली का मेला  देखो आने-जाने वालों का रेला !  जो है दिखता सब क्षण भंगुर  यूँ बादल की तरह उड़ जाये !  जो पेड़ बना , था कभी वह अंकुर  जीवन की थाह कोई नाप न पाये !  पेड़ जो मरा तो रह जाएगा  अंकुर  फिर बन जाएगा वृक्ष विशालकाय ! पर्दे पर नाचतेContinue reading “हमें यह रहस्य कौन समझाये?”

आज को संवारिये

जीवन नित नया, जो बीत गया  सो बीत गया! बीती बात बिसारिये  आज को  संवारिये,  अतीत की गठरी उतारिये  स्वयं को यूँ  ही न मारिये, आज को जियो होकर मुक्त  यूँ ही न हो जाये वह लुप्त,  आज की संभावनाएं असीमित  न कर ख़ुद को तूँ सीमित, स्वच्छंद भाव से जी हर पल  तभी सुनहराContinue reading “आज को संवारिये”

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