हमें यह रहस्य कौन समझाये?

ज़िंदगी चला-चली का मेला 

देखो आने-जाने वालों का रेला ! 

जो है दिखता सब क्षण भंगुर 

यूँ बादल की तरह उड़ जाये ! 

जो पेड़ बना , था कभी वह अंकुर 

जीवन की थाह कोई नाप न पाये ! 

पेड़ जो मरा तो रह जाएगा  अंकुर 

फिर बन जाएगा वृक्ष विशालकाय !

पर्दे पर नाचते हम सब चित्र 

कल परसों हो जायेंगे लुप्त 

फिर आयेगा नाचने कोई और 

इस बात पर ज़रा करिए गौर!

कौन है जो हम सब को नचाये 

इस मर्म को कौन जान पाये 

हमें यह रहस्य कौन समझाये?

कहाँ से आते,कहाँ चले जाते 

दिन छिपता , आ जातीं रातें 

आज जो रिश्ते, कल मिट जाएँ 

 काल क्यों खड़ा रहता मुँह बायें! 

इस मर्म को कौन जान पाये 

इस गुत्थी को कौन सुलझाये ? 

अरुण भगत

सर्वाधिकार सुरक्षित

#arunbhagatwrites#poetry# poeticoutpourings#outpouringsof myheart#writer#Indianwriter#englishpoetry#hindipoetry#poetryofthesoul

Published by Arun Bhagat

I love to talk through my writings.@

2 thoughts on “हमें यह रहस्य कौन समझाये?

Leave a comment

Why are you reporting this comment?

Report type
Design a site like this with WordPress.com
Get started