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फ़ौलाद है तूँ, कर फ़तह हासिल

न ग़म कर, न हो उदास,

है ज़िंदगी का अज़ीम तोहफ़ा तेरे पास,

ख़ुदा के वास्ते न कर इसे ज़ाया,

बड़ी मुश्किलों से इंसानी चोला तूने पाया,

ज़िंदगी का प्याला जी भर के पी,

न दम घोंट अपना, तूँ खुल के जी,

ख़ुद को ख़ुदा का अक्स जान कर,

अपनी सलाहियतों पे तूँ मान कर,

ज़र्रे-ज़र्रे पे तूँ लिख अपना नाम,

तेरे इस सफ़र में मायूसिओं का क्या काम,

अपनी नायाब नेमतों पे फ़ख़्र कर,

अहसासे कमतरी में न मर,

बन जाँबाज़ सिपाही जिसे शिकस्त नहीं गँवारा,

ग़ज़ब के हौंसलों ने जिसे है संवारा,

ज़िंदगी बेशक है इक दुश्वार जंग,

सफ़ेद से ज़्यादा स्याह हैं इस के रंग,

जब भी गिरे, उठ और आगे तूँ बढ़,

याद रख चेतन है तूँ, है नहीं इक जड़,

मुग़ालतों में न पड़, न हो ग़ाफ़िल,

फ़ौलाद है तूँ, कर फ़तह हासिल…

अरुण भगत

सर्वाधिकार सुरक्षित

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कभी तो वो दिन आएगा

कभी तो वो दिन आएगा,

जब दिल दिल की राह पाएगा,

कभी तो देखेंगे वो सहर,

ख़ुदा की जब बरसेगी मेहर,

जब मोहब्बत न होगी रुसवा,

इंसानियत का परचम लहराएगा,

जब सच का होगा राज,

और झूठ का होगा पर्दाफ़ाश,

जब इंसाफ़ की तूती बजेगी,

जब अमन की बगिया सजेगी,

जब गुस्ताखी न होगी किसी की शान में,

कमी न होगी किसी के मान में,

जब इंसानी क़दरों का लोहा गढ़ेगा,

जब सच्चे का हौंसला बढ़ेगा,

जब जंगों की न होंगी बातें,

न होंगी नफ़रत की काली रातें,

तब सब ले हाथों में हाथ,

उजालों की और बढ़ेंगे साथ-साथ,

इक नयी ख़ुशनुमा ज़िंदगी की करेंगे शुरुआत,

ख़ुशबू जिसकी महकेगी, निराली होगी जिसकी बात!

अरुण भगत

सर्वाधिकार सुरक्षित

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पर फैला के मैं उड़ जाऊँ

मैं आसमानों को छूने को बेक़रार,

असल तरक़्क़ी के लिए है यही दरकार,

पर फैला के मैं उड़ जाऊँ,

अपना मुस्तक़बिल रौशन कर पाऊँ,

यही मेरी चाह, यही मेरा अरमान,

और यही है ख़ुदा का फ़रमान,

जहां औरत की इज़्ज़त, वहीं फ़रिश्ते बसते,

उस माशरे के खुल जाते सब रस्ते,

काँधे से तुम्हारे काँधा मिला जो मैं चलूँ,

अपने सब जायज़ अरमान मैं पूरे करूँ,

जी पाऊँ बेख़ौफ़ चैन से ज़िंदगी,

न हो जिसमे कोई ज़ोर जबर और दरिन्दगी,

बन सकूँ वो गुल जिससे रौशन गुलज़ार हो,

न अंधेरों में ग़ुम मेरी ज़िंदगी बेज़ार हो,

यही वक़्त का है मिज़ाज, यही इंसाफ़ का है तक़ाज़ा,

और इसी से होगा क़ौम की इज़्ज़त में इज़ाफ़ा,

इसी से बनेगी यह दुनिया पुर अमन, पुर चैन,

और ख़ुशनुमा सुबह में तबदील होगी मायूस सी यह रैन!

अरुण भगत

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अपने वतन से प्यार कर

गणतंत्र दिवस पर अपने प्यारे देश के हर बाशिंदे के नाम यह पैग़ाम

अपने वतन से प्यार कर,

इस पे जाँनिसार कर,

जिसकी गोद में तूँ पला,

उसपे क्यों न हो फ़ख्र भला,

दिल से ख़िदमत इसकी कर,

जी भर के इस पे नाज़ कर,

जिस पाकीज़ा ख़ाक से तूँ बना,

हो जा उस ख़ाक पे फ़ना,

पीरों-फ़क़ीरों की यह ज़मीं,

किस बात की इसमें कमी,

ख़ुशक़िस्मती यह तूँ अपनी मान

कि तूँ है इसकी आन-बान,

जिसने तुझे है निखारा,

उसके आसमाँ का बन सितारा,

अमन-चैन का फहरा परचम,

दुनिया के ज़ख्मों पे लगा मरहम,

अपनी सरज़मीं का रौशन नाम कर,

कुछ कारगर करना चाहे अगर!

अरुण भगत

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इस लम्हे का कर तस्सवुर

गुज़रे वक़्त को न आवाज़ दे, वो न लौट कर आएगा,

इस लम्हे का कर तस्सवुर१,इसी में सब कुछ पाएगा,

माज़ी२ तो फ़ना हो गया, वक़्त के आग़ोश में सो गया,

जो बीत गया सो बीत गया, गए लम्हों में वो खो गया,

भूल जा उसकी ख़लिश३, नयी मंज़िलों की तलाश कर,

ज़िंदगी में मायनों के रंग भरना चाहता तूँ अगर,

ज़िंदगी बस यही है जो तेरे सामने खड़ी,

न इसके कुछ आगे न पीछे, ऐसी ही है यह कड़ी,

इसका एहतराम४ कर, अपने आग़ोश में इसे ले भर,

माज़ी मुस्तक़बिल५ की कश्मकश में न इसे बर्बाद कर,

यही वक़्त है, उड़ान भर, नए आसमानों में घर बना,

कौन है जो तुम्हें रोके, कौन कर सकता मना,

इस लम्हे को पुरज़ोर जी, यूँही न घुट-घुट के मर,

सारी कायनात६ है तेरी, जी भर के तूँ इसे प्यार कर!

१.ख़्याल, ध्यान

२.बीता वक़्त

३.चुभन

४.इज़्ज़त

५.आने वाला वक़्त

६.सृष्टि

अरुण भगत

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जीने की तमन्ना है तो खुल के जी

जीने की तमन्ना है तो खुल के जी,

घुट-घुट कर जीने के लिए लोग हैं ना,

मरना है तो इक बार शान से मर,

रोज़ तिल-तिल मरने वाले लोग हैं ना,

बनाना है तो सच को अपना हमसाया बना,

झूठ का निवाला परोसने वाले लोग हैं ना,

इबादत करनी है तो उस परवरदीगार की कर,

इंसान को ख़ुदा बताने वाले अदना लोग हैं ना,

बनाना है तो नेकनीयती को अपनी पहचान बना,

अपनी बदनीयती का परचम फहराने वाले लोग हैं ना,

गिर-गिर कर उठ जाने का जज़्बा हो तेरे अंदर,

इक बार ही गिरने पर ढह जाने वाले लोग हैं ना,

अपने अक्स को फ़ख़्र से देख पाने की कुव्वत कर पैदा,

ख़ुद से नज़र मिलने पर शर्मसार होने वाले लोग हैं ना,

अपनी मोहब्बत को बना दुनिया के ज़ख्मों का मरहम,

नफ़रतों की आग में सब कुछ झोंकने के लिए लोग हैं ना,

अपने क़द को इतना बढ़ा कि कायनात भी करे रश्क,

अपने बौनेपन का मुज़ाहरा करने वाले लोग हैं ना!

* Inspired by a very fine piece of Urdu poetry that I happened to listen to the other day.

अरुण भगत

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Love is the Elixir of Life

Love is a many-splendored flower,

A flower that grows in a heart-warming bower,

Its fragrance seeps into every pore of your being,

It imparts to your soul a new way of seeing,

It is the refuge to every lost soul,

It has the magic to make a truncated self whole,

It holds us all in its warm embrace,

It is the manifestation of God’s infinite grace,

It is the balm to every festering sore,

It is the anti-thesis of blood and gore,

It pulsates in a mother deer’s heart,

While she watches her fawns here and there dart,

It is reflected in a father’s tremulous pride

As he sees his child away to glory ride,

It is what lights up the beloved’s eyes,

When she sees her lover emerge from his beguiling guise,

It is what infuses a new life into a barren heart.

It is what makes one transcend every pettiness and wart,

It is the warm hand which every wayward wanderer does guide,

It is the very chariot that the Presence does ride,

It is what can douse the fires of hate,

It has the power to change the world’s trajectory and fate,

It has the power to so much us teach

That our manifest destiny can we reach,

And realise that to love we were born,

And be the celestial light that suffuses the sky every morn!

Let us of our hearts open the flood gates

So that we can transform every soul that sucks and hates,

Let us all get together to give love a chance,

And see every atom of creation perk up and dance!

Arun Bhagat

All rights reserved

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In the Womb of Nothingness

While you go buzzing here and there,

God knows where,

Stop for a while to rest,

Do not be a pest!

All this frantic running,

With one for the other gunning,

Will you nowhere land,

Life will slip through like quick sand!

While you crazily to nowhere run,

The beauty of life you shun,

And the art of doing nothing you lose,

That is how you cook your own goose!

In the womb of nothingness lies the essence,

There resides the Primal Cause and Presence!

Arun Bhagat

All rights reserved

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नव वर्ष की पूर्व-संध्या पर कुछ विचार, मन के उद्ग़ार

बाईस तईस कुछ नहीं,

नया पुराना कुछ नहीं,

समय तो एक सतत प्रवाह है,

नयी हो सकती है हमारी सोच,

एक नया दृष्टिकोण,

जीने का एक नया अन्दाज़,

नए गंतव्यों की ओर बढ़ जाने की चाह,

मन की एक नयी लहर, एक नयी मौज,

पुराने जाल में फँसे रहे,

वही पुरानी सोच, पुराने मापदंड,

वही पुरानी ऊब भरी ज़िंदगी,

वही पुराने थके हुए रिश्ते,

वही हालातों से पुरानी लड़ाई,

तो नए साल का क्या अभिप्राय,

क्या उल्लास, क्या उत्सव,

अगर अंदर कुछ नहीं बदला,

तो यह उत्सव भी एक बेमानी रीत ही है,

नया-नया कह मन को बहलाते,

जबकि जीवन में नया कुछ भी तो नहीं,

जब खा पी, गा, नाच, लकीर के फ़क़ीर,

नए साल का करें शोरोगुल से स्वागत,

तो यह सोचें अवश्य कि नया क्या है

अगर उसी घिसी-पिटी ज़िंदगी में

लौट जाना है कल कोल्हू के बैल बन,

तो जश्न किस बात का, किस बात का नृत्य,

जीवन तो वह है जो हो नित नया,

लाये नयी चेतना, नयी ऊर्जा,

विहंगम दृश्यों को दर्शाते

चित के नये पट खोल दे,

फिर हर पल नया पल,

हर दिन नया साल,

जीवन ही बन जाए उत्सव!

अरुण भगत

सर्वाधिकार सुरक्षित

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प्रकाश फैलाए नव वर्ष

प्रकाश फैलाए नव वर्ष

हर ओर हो उल्लास और हर्ष,

सत्य की गुंजार हो,

प्रेम पथ विस्तार हो,

स्नेह का डंका बजे,

वैर भाव हर कोई तजे,

चरित्र का जीर्णोद्धार हो,

हर उच्च स्वप्न साकार हो,

मंगलदायिनी यह धरा,

दूर हों जर और जरा,

युद्धों का तांडव बंद हो,

सुदृष्टि पाएँ जो अंध हों,

धरती के घाव जो हैं हरे,

हर एक मानव उन्हें भरे,

हो निर्भय निर्वैर आगे बढ़ें

किसी आततायी से न डरें,

आत्म-कल्याण का खुले द्वार,

जीवन मूल्यों पर हो विचार,

नव वर्ष की यह मंगल बेला,

सद्कर्मों का लग जाए मेला,

जड़-चेतन का कल्याण हो,

गौरव का संज्ञान हो!

नव वर्ष की आपक सब को ढेरों शुभकामनाएँ

अरुण भगत

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