Go By the Rhythm of Life

Go as the day goes,

Flow as the river flows,

Shine as the stars shine

And gems of being mine.

Go by the rhythm of life,

Surrender to this game of dice,

Fly and glide like the  birds do

As the celestial dome they woo.

Dive like fish into the mighty ocean,

Keep up with their cosmic dance and motion,

As any seer can fathom and see,

That is the wise way to live and be! 

Arun Bhagat

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चाय दिवस पर चाय को समर्पित एक कविता

 

चाय की भी क्या ग़ज़ब कहानी है 

चाय से ही तो रगों में रवानी है ! 

चाय की है दीवानी सारी दुनिया 

बच्चू चाचा हों या फिर हो मुनिया !

चाय है तो हमारी शामें रंगीन हैं 

चाय न कोई पूछे तो तौहीन है ! 

चाय से है यारों की महफ़िल सजती 

ख़ुशबू चाय की मानो शहनाई हो बजती! 

चाय ने कितने रिश्तों को बाँध के है रखा 

बहुत खोया जिसने इसका स्वाद है न चखा! 

चीन हो या जापान या हो भारत महान 

लेकर चाय की चुस्की वृद्ध बन जाते जवान ! 

न होती चाय की खेती, न इसकी तिजारत 

तो कितनों के पेट से होती रोटी  नदारद !

चाय न होती तो सफ़र कैसे बनते  यादगार 

 कैसे होते मधुर स्मृतिओं के घोड़े पर सवार ! 

चाय दिवस पर जो करे इसकी महिमा का बखान 

पुण्य का भागी बने, सदैव हो उसका कल्याण ! 😊

अरुण भगत

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वही कहलाता जीवन योद्धा

मन विकल हो तो उसे ढाँढस बँधाइए 

गर्त में निराशा की कभी न जाइए! 

पग-पग मुश्किलें रोकेंगी रास्ता 

विकराल बाधाओं से पड़ेगा वास्ता, 

फ़न फैलाए मिलेंगे विषधारी नाग 

चहूँओर होगी झुलसा देने वाली आग, 

साहसी  वही धैर्य का जिसके बाँध न टूटे 

विषाद-संताप का उसके ज्वालामुखी न फूटे,  

उफनती लहरों के बीच जो रहे अडिग अभय  

भय के रहते न करे अपनी ऊर्जा का अपव्यय,  

जीवन को बहुमूल्य जान जो जीता उसे भरपूर 

विषय-विकारों से रखता अपनी  नैया को दूर 

वही कहलाता जीवन योद्धा, वही कहावे शूर! 

अरुण भगत 

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हम गुज़र जाते हैं

वक्त गुज़र जाता है , इंसान गुज़र जाते हैं 

बस हम यूँ ही ठगे-ठगे खड़े रह जाते हैं! 

गुज़र जाते हैं दिन, गुज़र जाती हैं रातें 

गुज़र जाते हैं वाक़यात, रह जाती हैं बातें ! 

गुज़र गए पोरस, गुज़र गए सिकंदर 

मिट गए जहां से जिन्हें कहते थे धुरंधर ! 

गुज़र जाती हैं आँधियाँ, गुज़र जाते हैं वलवले 

यूँ ही चलते रहते हैं ये ज़िंदगी के सिलसिले ! 

गुज़र जाते हैं मरहले, गुज़र जाते हैं सफ़र 

यूँ ही देखने को मिलता है वक्त का असर!

सोचें तो वक्त नहीं गुज़रता, हम गुज़र जाते हैं 

वक्त के खेल की गहराई कहाँ जान पाते हैं ? 

1. वलवले= जोश, उत्तेजना 

2. ⁠मरहले= पड़ाव 

अरुण भगत

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हमें यह रहस्य कौन समझाये?

ज़िंदगी चला-चली का मेला 

देखो आने-जाने वालों का रेला ! 

जो है दिखता सब क्षण भंगुर 

यूँ बादल की तरह उड़ जाये ! 

जो पेड़ बना , था कभी वह अंकुर 

जीवन की थाह कोई नाप न पाये ! 

पेड़ जो मरा तो रह जाएगा  अंकुर 

फिर बन जाएगा वृक्ष विशालकाय !

पर्दे पर नाचते हम सब चित्र 

कल परसों हो जायेंगे लुप्त 

फिर आयेगा नाचने कोई और 

इस बात पर ज़रा करिए गौर!

कौन है जो हम सब को नचाये 

इस मर्म को कौन जान पाये 

हमें यह रहस्य कौन समझाये?

कहाँ से आते,कहाँ चले जाते 

दिन छिपता , आ जातीं रातें 

आज जो रिश्ते, कल मिट जाएँ 

 काल क्यों खड़ा रहता मुँह बायें! 

इस मर्म को कौन जान पाये 

इस गुत्थी को कौन सुलझाये ? 

अरुण भगत

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आज को संवारिये

जीवन नित नया,

जो बीत गया 

सो बीत गया!

बीती बात बिसारिये 

आज को  संवारिये, 

अतीत की गठरी उतारिये 

स्वयं को यूँ  ही न मारिये,

आज को जियो होकर मुक्त 

यूँ ही न हो जाये वह लुप्त, 

आज की संभावनाएं असीमित 

न कर ख़ुद को तूँ सीमित,

स्वच्छंद भाव से जी हर पल 

तभी सुनहरा होगा कल ,

देखो बुलाती नई आशाएँ 

नई हवाएँ, नई दिशाएँ ,

नया है सूरज, नई है धरा 

 इस सच को ले समझ ज़रा,

नई बेला में हो जा नया 

जाने दे जो कुछ भी गया, 

जीवन नित नया, 

जो बीत गया 

सो बीत गया ! 

अरुण भगत 

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Why?

Why is it that

In today’s world love goes a begging 

While hate fumes and thrives? 

Why is it that 

Politeness is construed as a weakness 

While insolence rules the roost? 

Why is it that

Honesty is shown the door

While dishonesty base passions drives? 

Why is it that

Humility is considered passe 

While everyone’s ego needs a boost? 

Why is it that 

Grossness calls the shots

While refinement is booted out?

Why is it that

Chaotic noise holds sway

While to be heard you have to shout out? 

When will we 

This  perverse order invert 

That our civilised life 

Is about to subvert? 

Arun Bhagat

All rights reserved

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निश्चय कर आगे बढ़ जा

लाँघ सब सीमाओं को 

तूँ हो जा विस्तृत,

नहीं बना तूँ पराजय हेतु 

न होने को तिरस्कृत! 

अपने बंधन खोल कर 

तूँ हो जा मुक्त,

जान ले, असीम सम्भावनाओं से 

सदा से है तूँ युक्त!  

विशालता है तेरी पूंजी 

अमरत्व तेरा गंतव्य,

विचलित न हो इस पथ से

यही है तेरा कर्तव्य! 

निश्चय कर आगे बढ़ जा 

प्रकृति होगी तेरे साथ,

थामने जागृत हस्त को तेरे  

बढ़ेंगे हज़ारों हाथ! 

बन प्रकाशपुंज नभ में 

तूँ हो जा स्थापित,

देख तुझे मुक्त हो जायेंगे 

हैं जो कुंठाओं से श्रापित! 

अरुण भगत

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नये साल की नयी कहानी

भूल-चूक जी  माफ करो 

नये साल में मन साफ़ करो 

नये साल की नयी कहानी 

रगों में हो इक नयी रवानी 

नये साल की हों नयी उमंगें 

मन में हों पल्लवित नयी तरंगें 

नये साल की नयी हो बोली 

प्रेम-प्यार की खेलें होली 

नये साल की नयी हो बातें 

 निकले सूरज,छँट जाएँ रातें  

नये साल के नये इरादे 

पूरे करें जो किए हों वादे 

नये साल के नये हों रंग 

मोह भ्रम सब हो जायें भंग 

देखो,नयी मंज़िलें देती सदायें 

उन की तरफ़ हम कदम बढ़ाएँ! 

अरुण भगत

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गावो मंगल, मनाओ हर्ष

नव वर्ष हम सब के लिए और समस्त विश्व के लिए मंगलमय हो। 

 

देखो आया नूतन वर्ष 

गावो मंगल, मनाओ हर्ष 

विकसित हो एक नई चेतना 

मानव समझे मानव की वेदना 

हर दिल में  पनपे प्रेम अपार 

हो सुंदर जग का स्वप्न साकार 

सबल चरित्र हो, इरादे नेक 

ह्रदय से हो जायें सब एक 

न कोई कलह, न हो द्वेष 

निर्मलता ही रह जाये शेष 

क्यों न ले कर हाथों में हाथ 

सब हो जाएँ अंतर्मन से साथ 

सद्भाव का तरु हो जो पल्लवित 

हर्षित हो धरा, हम सब हों गर्वित 

अरुण भगत 

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