कल आया था और आज ही गया
बे-वफ़ा कहीं का ये साल भी गया
यूँ ही बीत जाती ज़िंदगी ख़्वाब जैसी
ढहे जाते रेत के इक नाज़ुक घर जैसी
यूँ ही तो गुज़र जाता है ये सफ़र तमाम
पलक झपकते आ जाता आखरी मुक़ाम
सामने इक समंदर, कहाँ इसका किनारा
ख़ुद इसमें उतरना, कोई न मिलेगा सहारा
अकेले ही आए थे और अकेले ही जायेंगे
कहाँ इस राज़ की कोई सिरा हम पायेंगे
अरुण भगत
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