कल ही तो आया था

कल आया था और आज ही गया 

बे-वफ़ा कहीं का ये साल भी गया 

यूँ ही बीत जाती ज़िंदगी ख़्वाब जैसी 

ढहे जाते रेत के इक नाज़ुक घर जैसी 

यूँ ही तो गुज़र जाता है ये सफ़र  तमाम 

पलक झपकते आ जाता आखरी मुक़ाम 

सामने इक समंदर, कहाँ इसका किनारा 

ख़ुद इसमें उतरना, कोई न मिलेगा सहारा 

अकेले ही आए थे और अकेले ही जायेंगे 

कहाँ इस राज़ की कोई सिरा हम पायेंगे 

अरुण भगत

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ज़िंदगी

ज़िंदगी जीना आसान थोड़ी है 

कितने सवाल खड़े रहते हैं मुँह बाये

गहराते रहते है हैं कितने स्याह साये 

कितनी मंज़िलें देती रहती हैं सदायें 

कितनी चाहतें लेती रहती हैं बलायें 

वक्त थोड़ा, उम्मीदों की फ़ेहरिस्त लंबी

कहाँ मिले है कोई हमख्याल साथी संगी 

यूं ही भाग-दौड़ में ज़िन्दगी गुज़र जाती है 

रेत की मानिंद उँगलियों से फिसल जाती है 

यूं ही बिखरता जाता है बशर रेशा रेशा 

सपनों की डोर हाथ से निकल जाती है 

मंज़िलें कहीं दूर खड़ी मुस्कुराती रहती हैं 

इंसान की आँखें बस ठगी सी रह जाती हैं 

इक ख़लिश कर देती है दिल को तार-तार 

जब सहने पड़ते हैं दुश्वारियों के बे-रहम वार 

मगर फिर भी, यारो, ज़िंदगी है तोहफ़ा नायाब 

इसे नेकी और शिद्दत से जीना ख़ुद में है सबाब  

१. बशर= इंसान 

२. ⁠ख़लिश = चुभन 

३. ⁠दुश्वारियां= मुश्किलें 

४. ⁠नायाब = अनमोल 

५. ⁠शिद्दत से = पूरे दिल से 

६. ⁠सबाब = पुण्य 

अरुण भगत

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The Elixir of Love

What is life without love?

A fraught desert by Jove! 

Love is what nourishes the soul,

Makes our truncated selves whole! 

Love is nectar for parched souls,

It makes worthwhile all our goals!

When love through our hearts does flow,

It makes us inside outside glow!

When love courses through our veins,

Indescribably rich are our gains!

It is the pole star to our life’s barge,

It makes our hearts delightfully large!

When love accompanies us on our way,

It keeps all barrenness of life at bay! 

Arun Bhagat

All rights reserved

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सुनो—

सुनो, क्या बोलते हैं चाँद तारे ,

कुदरत के अद्भुत नज़ारे,

कुछ कह रही है हर शाख,

चिता की सुलगती राख ,

कुछ बोलता है बहता पानी

जिसका नहीं कोई सानी ,

कुछ कह रहा है सघन वन,

बोल रहा तुम्हारा अंतर्मन ,

बोल रही है हर दिशा ,

कुछ बाँच रही गहरी निशा,

धिक्कार रही है आत्मा 

कब होगा मैं  का खात्मा, 

अहंकार सदा है बोलता,

न ज्ञान पट वह खोलता,

अपनी हांकते, न सुनते हम ,

यही जीवन की त्रासदी,

यही तो है इसका ग़म,

बोलना जहाँ है तुच्छ,

श्रवण है ज्ञान उच्च ,

यही कर लें हम आत्मसात, 

बिगड़ी बन जाये हर बात, 

सहज मिलेगा जीवन ज्ञान

निष्प्राण ज्यों पा जाए प्राण! 

अरुण भगत

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कहाँ है अमरत्व ?

समय बीतता है 

और समय के साथ

हम भी बीतते रहते हैं 

फिर एक दिन 

बिल्कुल ही बीत जाते हैं 

फिर रह जाती हैं समृतियां

खट्टी-मीठी, खोटी-खरी ,

जैसे-जैसे और समय बीतता है 

समृतियां भी धुंधलाने लगती हैं 

और फिर एक दिन 

बिल्कुल ही बिसर जाती हैं 

ग़ायब हो जाती हैं मानस-पटल से 

मानो कभी कोई था ही नहीं,

खेल ख़त्म, पैसा हज़म! 

फिर कहाँ है वह अमरत्व 

जिसे हम सदियों से खोज रहे हैं?

संसार में आने से पहले 

हम कुछ न थे 

जाने के बाद भी कुछ न होंगे 

पर यह सत्य हमें भाता नहीं 

 अहंकार इसे स्वीकारता नहीं 

इसलिए हम आजीवन पीछा करते रहते  हैं 

उस अमरत्व का जो शायद कभी था ही नहीं 

भागते रहते  हैं उस भ्रम की ओर 

जो मात्र मृगतृष्णा है, कुछ और नहीं! 

अरुण भगत

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मुझे उस जहाँ की तलाश है

मुझे उस जहां की तलाश है 

जहाँ खुश्क बंजर ज़मीं नहीं 

दिल का दिल से सरोकार है 

जहाँ हर ओर पनपती हैं मुहब्बतें 

फ़न सब को दरकार है 

सच के लिए खड़े होते लोग

जहाँ झूठ फ़रेब नागवार है 

इंसान इंसान के साथ खड़ा 

न कोई छोटा न कोई  बड़ा 

जहाँ मिट गईं हैं सरहदें 

न जंगों से दुनिया बेहाल है

जहां प्यार की बहती तरंगें 

नहीं नफ़रतों के दम घोंटू जाल हैं 

जहाँ चैन का है हर ओर पासारा 

न कोई बेचैनी का मारा बदहाल है 

जहाँ सब को मिलती  इज़्ज़त की रोटी 

न सर पे छत का मुँह बायें खड़ा सवाल है 

जहाँ बिकती नहीं हैं अस्मतें 

न जान को लेकर बवाल है 

साफ़ आब-ओ-हवा है मुहैया 

न हर दम लेना जहाँ  जंजाल है 

मुझे उस जहां की तलाश है

मुझे उस जहां की तलाश है— 

अरुण भगत

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उसने जो मेरे दर्द को—

Dedicated to my decidedly better half on her birthday. God bless her! 

उसने जो मेरे दर्द को अपना बना लिया 

उसकी इसी अदा पर मैं फ़िदा हो गया 

वो जो तूफ़ानों में खड़ी हुआ मेरे साथ 

लगा कि खुदा ने सर  पे रख दिया हाथ 

यूँ तो ज़िंदगी जैसे तैसे हो ही रही थी बसर 

उसका साथ बन गया आब-ए- हयात का असर 

मालूम नहीं कब  वो हमदर्द बन गई हमराह 

कौन पा सका है क़ुदरत के करिश्मों की थाह 

क्या मेरी लियाक़त कहाँ है  मेरी औक़ात  

कि खुदा की रहमतों की मैं कर सकूँ बात  

-आब-ए-हयात = अमृत 

लियाक़त = योग्यता 

अरुण भगत

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खुदा खैर करे

इस  ज़माने में कहाँ लेंगे जा कर पनाह

प्यार मोहब्बत की बात यहाँ बन गई गुनाह

जहाँ हर कोई रखता है दिल में वैर

वहाँ कौन लगे अपना, सब लगें हैं ग़ैर 

जहाँ अपने आप में डूब गया है हर बशर  

वहाँ क्योंकर हो किसी का किसी पे असर 

एक अंधी दौड़ में सब हो गए हैं शामिल  

किसे रोकें, पूछें इससे क्या होगा हासिल 

बात तो ये यकीनन है क़ाबिल-ए-गौर 

कहाँ जा के ठहरेगा ये अजब सा दौर 

जहाँ रोबोट बन गए हमदर्द और हमसाया 

इंसानी रिश्ते सब वहाँ हो रहें हैं ज़ाया 

तकनीकी तरक्की को लेकर जो है इतना जोश 

मसला ये पेचीदा है इसका कहाँ है हमें होश

घटती इंसानियत को देख दिल देता है रो 

खुदा खैर करे,हमें कोई राह दिखाये वो 

अरुण भगत 

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क्या बात हो —

क्या बात हो ग़म सारे ख़्वार(तबाह) हो जाएँ 

ख़ुशिओं का पकड़ें दामन, बेड़ा पार

 हो जाए 

क्या बात हो हम खुली किताब बन जाएँ 

दिल में हो सकूँ, ज़िंदगी झूम के गाये 

क्या बात हो ज़लज़ले भी हौंसला तोड़ न पाएँ 

जहाँ भी जाएँ,  सर उठा के बे-ख़ौफ़ ही जाएँ 

क्या बात हो कि रूह की पेशानी पे  ना हो कोई दाग़ 

ज़मीर को झुलसा ना सके ज़माने की कोई आग 

क्या बात हो कि ज़िंदगी की नेमत को ना करें ज़ाया 

गुनाहों से रहें दूर, पाकीज़गी बन जाये हमसाया 

  1. ख़्वार= तबाह 
  2. पेशानी = माथा 

अरुण भगत

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A Point to Ponder

सोचो तो सलवटों से भरी है तमाम रूह 

देखो तो एक शिकन भी नहीं है लिबास पर

  • शाकेब जलाली 

As the poet says above, many of us are so immaculately and impeccably dressed, often in branded clothes, if we can afford them, with not a wrinkle in sight. We make every attempt to look flawlessly smart and dapper. But ironically our inner being tells an entirely different story and we are seldom interested in that story in today’s world where outer appearances are all that we are bothered about. So many of us live double lives plagued by this sad duality and contradiction. Obviously when the outer garments are all aglow and wrinkle free but the soul is full of wrinkles, we can’t  be  happy and at peace with ourselves. So you see lot of unhappiness and violence  all around with depression and other mental health issues assuming epidemic proportions. We better watch out. The focus should be on developing a healthy core and nourishing our soul with truth, love and compassion. That is all that really matters! God bless everyone!

Arun Bhagat

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