खुदा खैर करे

इस  ज़माने में कहाँ लेंगे जा कर पनाह

प्यार मोहब्बत की बात यहाँ बन गई गुनाह

जहाँ हर कोई रखता है दिल में वैर

वहाँ कौन लगे अपना, सब लगें हैं ग़ैर 

जहाँ अपने आप में डूब गया है हर बशर  

वहाँ क्योंकर हो किसी का किसी पे असर 

एक अंधी दौड़ में सब हो गए हैं शामिल  

किसे रोकें, पूछें इससे क्या होगा हासिल 

बात तो ये यकीनन है क़ाबिल-ए-गौर 

कहाँ जा के ठहरेगा ये अजब सा दौर 

जहाँ रोबोट बन गए हमदर्द और हमसाया 

इंसानी रिश्ते सब वहाँ हो रहें हैं ज़ाया 

तकनीकी तरक्की को लेकर जो है इतना जोश 

मसला ये पेचीदा है इसका कहाँ है हमें होश

घटती इंसानियत को देख दिल देता है रो 

खुदा खैर करे,हमें कोई राह दिखाये वो 

अरुण भगत 

सर्वाधिकार सुरक्षित

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Published by Arun Bhagat

I love to talk through my writings.@

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