न जाने कहाँ थमेगी…

कहाँ गया वो सब अमन चैन,

जब दिन थे ख़ुशनुमा और सकूँ भरी थी रैन,

जब बादल बरसते थे दिल खोल कर,

जब हर बात न करनी पड़ती थी तोल कर,

जब मोर की तरह पंख खोले था दिल नाचता,

जब दिल का दिल से था क़ायम पूरा राब्ता,

तब मानो पंख लगाकर उड़ जाते थे दिन,

रह नहीं पाता था भाई भाई के बिन,

जब घरों के दरवाज़े सबके लिए होते थे खुले,

जब रह नहीं पाते थे एक दूसरे को बिना मिले जुले,

जब सुरीले होते थे गीत और होते थे मीठे सपने,

न होता था कोई ग़ैर, सब होते थे अपने,

तब बिन पैसों के भी थे सब धनी,

हर रिश्ते में लगता था जैसे मिल गयी हो कोई मणि,

ख़ुदगर्ज़ी के इस दौर में काफ़ूर हो गया जीने का मज़ा,

हर दिन लगे है बोझ और रात एक लम्बी सज़ा,

सही और ग़लत में है मिट गया सब फ़र्क़,

लालच के इस दौर में किरदार हो गया ग़र्क़,

न जाने कहाँ जा थमेगी यह अंधी दौड़,

जब लगी है हर तरफ़ गिरने-गिराने की होड़!

अरुण भगत

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Published by Arun Bhagat

I love to talk through my writings.@

14 thoughts on “न जाने कहाँ थमेगी…”

  1. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति है इस कविता में।
    धन्यवाद सर। 💐🙏

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  2. बिल्कुल सही कहा सर आपने। वक्त के साथ हर इंसान बदलता जा रहा है। सब मतलबी होते जा रहे हैं। पहले का वक्त बहुत अच्छा हुआ करता था।

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    1. धन्यवाद, राशी! मानवीय सम्बन्धों का ह्रास आज के समय की बड़ी चुनौतियों में से एक है जिसने हमारे जीवन की विडम्बनाओं को और बढ़ा दिया है!

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