किसी का आस–पास होना ही बहुत है,
चाहे न बतियाएँ, अपनी-अपनी व्यस्तताओं में रह जाएँ,
चाहे हो जाएँ खिन्न, और एक दूसरे पर गर्माएँ,
चाहे इम्तिहान लेते-लेते एक दूसरे का उकता ही जाएँ,
पर किसी का पास होना ही बहुत है,
यह तब पता लगता है जब वह जाए कहीं दूर,
जब ख़ालीपन खड़ा हो मुँह बाएँ और रहा हो घूर,
जब लगे समय जैसे गया है ठहर,
अधिक लम्बा सा होता जाए हर पहर,
जब न दे कोई दिल के द्वार पर दस्तक,
जब लगे जैसे शून्य हो गया हो मस्तक,
तब पता लगता है किसी का पास होना ही बहुत है!
कैसा यह विधि का विधान, कैसा यह अज्ञान,
जब पास हो तो किसी के मूल्य का न हो संज्ञान,
और जब हो दूर तो लगे जैसे खो दी हो अमूल्य निधि,
लेकिन होता यह तभी है जब न जानें हम जीने की विधि,
जब जो मिल जाए लगे तुच्छ, और खो जाने पर लगे सोना,
यही तो है अज्ञानता की त्रासदी और नासमझी का रोना!
जिसने ज्ञान चक्षु खोल के हर पल और सम्बंध को है जिया,
मंगल हुआ है उसका, जीवन सुधा को उसी ने है पिया!
अरुण भगत
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