When I Look at My Nonagenarian Father

When I look at my nonagenarian father,

I am quite amazed rather,

With many a remarkable feature,

He is doubtlessly a great teacher,

His remarkable will to live

Does all of us a valuable lesson give

That it is will that does a human drive,

It is tenacity that makes one live and thrive,

As a superhuman effort he makes to get up and walk,

At his tremendous courage I simply baulk,

As he sits still for hours on end,

I wonder which way his thoughts wend,

As day after day into vacancy does he stare,

It is perhaps age that he does defy and dare,

As through his long silences his energy does he conserve,

And that is perhaps how nature does him preserve,

I wonder what goes through his mind,

What it is that to life does him still bind,

As he neither says anything nor does ask,

Fathoming his needs also becomes a task,

As day after day towards him I perform my filial duty,

That in itself seems to become a thing of rare beauty,

The inexpressible bond between parent and child,

To put it in words ever so mild,

Makes me keep an eye on him

As a mother does upon her vulnerable child,

As my spouse stands solidly with me in all this,

To thank and bless her I never miss,

Sometimes his total lack of expression of any love or blessing,

I find quite testing and depressing,

I often feel like a robot running after him,

But I don’t let that my commitment dim,

His long life is a test for him and for us,

So why create any fuss,

It is God’s will that will be done,

To question it I am no one,

May be my father’s mind into another world has already wandered,

As he can probably see the ship of his life in this world foundered,

That leaves us to do towards him our bit,

And act as responsibly and lovingly as our God deems fit!

Arun Bhagat

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प्रभु को अपना खेवट बनाओ

विषय-विकारों से होकर वंचित,

अच्छाई को करके संचित,

भले मानस बन जाओ,

चिरकाल तक सुख पाओ,

विषय-विकार और राग-द्वेष,

यह सब हैं झूठे परिवेश,

कीचड़ में खिलो कमल की भाँति,

पाओ परम आनंद और शांति,

मन जिसका है निर्मल धारा,

वासनाओं से वह कभी न हारा,

निर्मल हृदय में प्रभु का वास,

भोले पंछी के वह रहते पास,

तुम भी निर्मल बन जाओ,

जीवन सफल बनाओ,

मानव जीवन है दुर्लभ हीरा,

कृष्ण की तुम बन जाओ मीरा,

खुल जाएगा मोक्ष-द्वार,

हो जाएगा बेड़ा पार,

प्रभु को अपना खेवट बनाओ,

भवसागर पार कर जाओ!

अरुण भगत

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करें जागृत भीतर के बुद्ध

जीवित होने का उत्सव मनाएँ,

प्रेम की अविरल गंगा बहाएँ,

सब को अपने गले लगाएँ,

जीवन-सार समझें-समझाएँ,

जीवन का हर पल अनमोल,

कौन है जाने इसका मोल,

पल में है जीवन अपार,

पल में हो हो जाए बेड़ा पार,

इस क्षण की महिमा जिसने जानी,

वही पंडित और वही है ज्ञानी,

पल में प्रगट होती सृष्टि,

पल दे सकता दिव्य-दृष्टि,

पल कर सकता है सब कुछ खंडित,

पल कर सकता महिमा-मंडित,

इस पल को अपना सब कुछ जानें,

जीवन का अंतिम सत्य इसे मानें,

इसकी संभावनाओं को करें साकार,

स्व-अस्तित्व को दें उज्वल आकार,

हो व्यापक सोच और आचरण शुद्ध,

करें जागृत भीतर के बुद्ध,

तभी होगा सार्थक मानव-परिधान,

जब तजेंगे मोह अभिमान,

और तजेंगे मूढ़-बुद्धि,

तभी होगी आत्म-शुद्धि,

जब बनेंगे गुणों की ख़ान,

संभव तब होगा अमृत-पान!

अरुण भगत

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इससे बहुमूल्य न कोई युक्ति

मोह माया सब त्यागिए,

लोभ, मोह, अहंकार,

गहन निद्रा से जागिए,

तजिये सर्व विकार!

तजिये सर्व विकार,

हर बंधन से मुक्ति पाइए,

रखिए सदा सुविचार,

मेहनत का ही खाइए!

मेहनत का ही खाइए,

आत्मा रहेगी तृप्त,

कुमार्ग पर न जाइए,

कुसंगत में न होइए लिप्त!

कुसंगत में न होइए लिप्त,

इस बात को विचारिए,

चला जाए न व्यर्थ और रिक्त,

अनमोल जीवन को सँवारिए!

अनमोल जीवन को सँवारिए,

यह फिर न आएगा हाथ,

मन के कूड़ को बुहारिये,

प्रभु निश्चित देंगे साथ!

प्रभु निश्चित देंगे साथ,

हो जाओगे स्वच्छंद और मुक्त,

अमूल्य निधि लगेगी हाथ,

जीवन हो जाएगा आनंद युक्त!

जीवन हो जाएगा आनंद युक्त,

इसी जीवन में होगी मुक्ति,

मन में पैठाइए सूत्र उक्त,

इससे बहुमूल्य न कोई युक्ति!

अरुण भगत

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कहाँ से पकड़ें ज़िंदगी का छोर

यह ज़िंदगी का मेला,

है क़िस्मत का खेला,

या समय का है रेला

जिसमें सब कुछ बह जाता,

कुछ समझ नहीं आता,

कहाँ से पकड़ें ज़िंदगी का छोर,

यह ले जाए हमें किस ओर,

कभी लगे बहुत कुछ है अपना,

कभी सोचें, सब है सपना,

कभी लगाएँ इसको गुहार,

कभी लगे जैसे रही हो दुलार,

पल में तोला, पल में माशा,

कौन है समझे इसकी भाषा,

कभी देती यह पहाड़ से दुःख ,

कभी झोली में सारे डाले सुख,

क्या न्याय, क्या अन्याय,

कौन जाने इसका अभिप्राय,

कभी रुदन, कभी सुंदर गीत,

कौन है जाने इसकी रीत,

विस्तार व्यापक, रहस्य है गहरा,

इसके सामने कौन है ठहरा,

निहारते इसके रूप और रंग,

हम बहते जाएँ इसके संग,

इससे अपना नाता जोड़ें,

कहाँ ले जाए, इसपे छोड़ें!

अरुण भगत

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आओ फिर बच्चे बन जाएँ

आओ फिर बच्चे बन जाएँ,

चंदा मामा से बतियाएँ,

उड़ें पवन के साथ

डाल हाथों में हाथ,

कोई भेद-भाव न जानें,

सबको अपना ही मानें,

अभी रूठें, , अभी मन जाएँ,

सबसे प्यार हैं पाएँ,

बालक बन जाएँ अबोध,

फैलाएँ हर्ष और प्रमोद,

फिर से पक्के दोस्त बनाएँ,

एक-दूजे पे वारी जाएँ,

बीती बात का न बोझ उठाएँ,

नित नए बन जाएँ,

बचपन का क्या कहना,

वो तो है जीवन का गहना,

हमारे अंदर जो बच्चा पलता,

सदा रहे वह फूलता-फलता,

मीठी लोरी उसे सुनाएँ,

लाड़ करें और उसे रिझाएँ,

देखें, कहीं न जाए खो

हमारे जीवन की है वह लौ!

बाल दिवस पर हम सब के अंदर छिपे प्यारे नन्हे से बालक को समर्पित है यह रचना!

अरुण भगत

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ए रब, हमें ले चल उस दुनिया में वापिस

खुद से क्या चाहिए मुझे

मैं खुद ही न जानूँ,

है दिल में कोई ख़लिश,

मैं खुद ही न मानूँ,

बे नूर सा क्यों लगे मंज़र,

कौन है यह जाने,

म्यानों से बाहर निकले हैं ख़ंजर,

हवा में हैं गिले-शिकवे और ताने,

इंसान इंसान से पाले वैर,

हर कोई लगे है ग़ैर,

फ़िज़ा में घुल गया है ज़हर,

ख़ौफ़ज़दा से रहें हम आठों पहर,

हम तो चले थे बनाने दुनिया को जन्नत,

इस बेज़ार ज़िंदगी की तो न माँगी थी मन्नत,

यह वक़्त हमें कहाँ ले आया,

इस तरक़्क़ी से क्या है हमने पाया

जिसने अपनों को अपनों से कर दिया जुदा,

कैसा अजब सा बन गया है यह मु’आशरा , ए ख़ुदा,

चलने लगी हैं कैसी यह खुश्क हवाएँ

जिनमें न सुनायी दें किसी को किसी की सदाएँ,

ए रब, हमें ले चल उस दुनिया में वापिस,

जहां एहसास थे ज़िंदा और अख़लाक था हाफ़िज़,

जहां ख़ुदा का था बड़ा करम,

जहां रूहें थी रौशन और दिल थे नरम!

अरुण भगत

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खुद से मुँह कौन मोड़ सका है?

खुद से दूर भाग कर कहाँ जाएँगे,

खुद से दूर जा कर क्या पाएँगे,

खुद से दूर भाग कर जा सकते कहाँ,

जहां भी जा छुपेंगे, खुद को पाएँगे वहाँ,

खुद से मुँह कौन मोड़ सका है,

खुद से नाता कौन तोड़ सका है,

खुद से अगर होंगे ख़फ़ा,

तो किसी से न कर पाएँगे वफ़ा,

खुद से अगर होंगे बेज़ार,

तो हर मंज़र पर पाएँगे खुद को लाचार,

ज़रूरी है खुद से हाथ मिलाना,

ग़र चाहते है हम सकूँ पाना,

खुद से रिश्ते में ग़र होगा चैन,

तो ही ख़ुशगवार होंगे दिन और रैन,

खुद की तरफ़ बढ़ाएँगे ग़र दोस्ती का हाथ,

तो सारे जहां का मिल जाएगा साथ,

खुद को यूँ सँवारिये कि खुद पे कर सकें फ़ख़्र,

फिर बेहतर लगेगी ज़मीं और उम्दा लगेगा अब्र ,

खुद से ही शुरू होता है ख़ुदा तक का सफ़र,

खुद से होंगे मुतमइन तो ज़िंदगी होगी बा-असर!

अरुण भगत

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फ़िज़ा में घुला ज़हर

फ़िज़ा में घुला ज़हर,

कुदरत ने बरसाया क़हर,

साँस-साँस को हुए मोहताज,

जो खुद को समझें सरताज,

धुएँ और गर्द के जिन्न खड़े मुँह बायें,

कुछ समझ न आए हम कहाँ जाएँ,

यह हमारा ही तो किया-कराया है,

कुदरत को हमने समझा पराया है,

खुद को हमने जाना आला,

खुद ही तो बुना अपनी बर्बादी का जाला,

हमने ही तो कुदरत से खेला,

लो आया अब बर्बादी का रेला,

इससे बच के कहाँ जाएँगे,

अपनी करनी का फल तो ज़रूर पाएँगे,

अपने किए पे आज भी हम कहाँ पशेमान हैं,

कायनात पर फ़तह पाने का आज भी अरमान हैं,

हमारा अहम ही हमें ले डूबा है,

अब ख़ुदा भी हमसे ऊबा है,

अब रब ने भी हमसे मुँह मोड़ लिया है,

हाल पे अपने उसने हमें छोड़ दिया है,

जब अपनी ग़लतियों से न लें हम कोई सीख,

तो क्यों कर मिले हमें रहम की भीख,

लगता है दुश्वारियाँ यूँ ही बढ़ती जाएँगी,

आने वाली नस्लें हमें खतावार पाएँगी,

यह बात नाउम्मीदी की हमारी आपसी है,

पर लगता नहीं कि अब जल्द कोई वापसी है,

जितना आगे निकल जाएँगे, मुश्किल होगी उतनी ही वापसी,

इसे समझना भी है लाज़िम, यह जो बात है हमारी आपसी!

अरुण भगत

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When Will We Wake?

Thoughtless crowds surge,

Bodies with bodies merge,

There is jostling mad,

Portends a situation grim and bad,

Precious lives at stake,

When will we wake?

Tragedies waiting to happen every day,

Can we out of this sorry mess find our way?

A small trigger, the berserk crowds go to meet a terrible end,

When will we our way back to sanity wend?

Why do we in droves go to court trouble,

When we know life is just a bubble,

Why all the frenzy and the insane dare,

Why to utmost danger your lives lay bare?

I thank my claustrophobia and my sense,

Thank God my mind is not so dense

That I should join hands with the throngs hurtling to their doom,

Thank God in my life there is for wisdom some room!

Arun Bhagat

Self-composed poem

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