आओ फिर बच्चे बन जाएँ,
चंदा मामा से बतियाएँ,
उड़ें पवन के साथ
डाल हाथों में हाथ,
कोई भेद-भाव न जानें,
सबको अपना ही मानें,
अभी रूठें, , अभी मन जाएँ,
सबसे प्यार हैं पाएँ,
बालक बन जाएँ अबोध,
फैलाएँ हर्ष और प्रमोद,
फिर से पक्के दोस्त बनाएँ,
एक-दूजे पे वारी जाएँ,
बीती बात का न बोझ उठाएँ,
नित नए बन जाएँ,
बचपन का क्या कहना,
वो तो है जीवन का गहना,
हमारे अंदर जो बच्चा पलता,
सदा रहे वह फूलता-फलता,
मीठी लोरी उसे सुनाएँ,
लाड़ करें और उसे रिझाएँ,
देखें, कहीं न जाए खो
हमारे जीवन की है वह लौ!
बाल दिवस पर हम सब के अंदर छिपे प्यारे नन्हे से बालक को समर्पित है यह रचना!
अरुण भगत
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