फ़िज़ा में घुला ज़हर,
कुदरत ने बरसाया क़हर,
साँस-साँस को हुए मोहताज,
जो खुद को समझें सरताज,
धुएँ और गर्द के जिन्न खड़े मुँह बायें,
कुछ समझ न आए हम कहाँ जाएँ,
यह हमारा ही तो किया-कराया है,
कुदरत को हमने समझा पराया है,
खुद को हमने जाना आला,
खुद ही तो बुना अपनी बर्बादी का जाला,
हमने ही तो कुदरत से खेला,
लो आया अब बर्बादी का रेला,
इससे बच के कहाँ जाएँगे,
अपनी करनी का फल तो ज़रूर पाएँगे,
अपने किए पे आज भी हम कहाँ पशेमान हैं,
कायनात पर फ़तह पाने का आज भी अरमान हैं,
हमारा अहम ही हमें ले डूबा है,
अब ख़ुदा भी हमसे ऊबा है,
अब रब ने भी हमसे मुँह मोड़ लिया है,
हाल पे अपने उसने हमें छोड़ दिया है,
जब अपनी ग़लतियों से न लें हम कोई सीख,
तो क्यों कर मिले हमें रहम की भीख,
लगता है दुश्वारियाँ यूँ ही बढ़ती जाएँगी,
आने वाली नस्लें हमें खतावार पाएँगी,
यह बात नाउम्मीदी की हमारी आपसी है,
पर लगता नहीं कि अब जल्द कोई वापसी है,
जितना आगे निकल जाएँगे, मुश्किल होगी उतनी ही वापसी,
इसे समझना भी है लाज़िम, यह जो बात है हमारी आपसी!
अरुण भगत
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