मैं आसमानों को छूने को बेक़रार,
असल तरक़्क़ी के लिए है यही दरकार,
पर फैला के मैं उड़ जाऊँ,
अपना मुस्तक़बिल रौशन कर पाऊँ,
यही मेरी चाह, यही मेरा अरमान,
और यही है ख़ुदा का फ़रमान,
जहां औरत की इज़्ज़त, वहीं फ़रिश्ते बसते,
उस माशरे के खुल जाते सब रस्ते,
काँधे से तुम्हारे काँधा मिला जो मैं चलूँ,
अपने सब जायज़ अरमान मैं पूरे करूँ,
जी पाऊँ बेख़ौफ़ चैन से ज़िंदगी,
न हो जिसमे कोई ज़ोर जबर और दरिन्दगी,
बन सकूँ वो गुल जिससे रौशन गुलज़ार हो,
न अंधेरों में ग़ुम मेरी ज़िंदगी बेज़ार हो,
यही वक़्त का है मिज़ाज, यही इंसाफ़ का है तक़ाज़ा,
और इसी से होगा क़ौम की इज़्ज़त में इज़ाफ़ा,
इसी से बनेगी यह दुनिया पुर अमन, पुर चैन,
और ख़ुशनुमा सुबह में तबदील होगी मायूस सी यह रैन!
अरुण भगत
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