मानवता का यह कैसा रूप?

किसे फ़िक्र दुनिया कहाँ खड़ी

सबको अपनी-अपनी हैं पड़ी,

अपनी तूती सभी बजायें,

अपनी दुकान सभी सजायें,

अपना शंख नाद स्वयं ही करते,

अपने गुणों का दम ख़ुद ही भरते,

अपने मोहपाश में ख़ुद ही जकड़े,

खड़े अहम् का दामन पकड़े,

दंभ जिनके सिर चढ़ कर कर बोले,

उनके ज्ञान चक्षु कोई कैसे खोले,

उल्टी हो गई जगत की रीत,

कहाँ प्रेम है, कहाँ है प्रीत,

कहाँ उल्लास है, कहाँ है हर्ष,

दिल जैसे हो गये ठंडे फ़र्श,

हम सब भटकें रीते-रीते,

किसी के ज़ख़्म कहाँ हैं सीते,

लुप्त हुई मीठी रिश्तों की धूप,

मानवता का यह कैसा रूप?

अरुण भगत

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न करो ख़ुद को ज़ाया

मैंने जब उस अजनबी को गले लगाया.

पहले तो वह ठिठका, फिर मुस्कुराया,

बोला,” क्या है इसमें तुम्हारा मतलब,

या फिर है यह कोई तुम्हारी गफ़लत?

दिल का सहरा तो इक-इक बूँद को तरसे,

आज मोहब्बत की बरखा यहाँ कहाँ है बरसे,

जब बंद आँखों से हर कोई अंधी दौड़ में भागे,

तुम्हारी आँख खुली कैसे, कैसे तुम जागे?

आज जब हर कोई ख़ुद को ख़ुदा है जाने,

कौन किसी को है जाने, कौन है माने?

लगता है किसी और दुनिया से हो तुम उतर आये,

जहां नहीं ख़ुदपरस्ती के गहराते डसते साये,

जहां प्यार की मीठी नरम धूप है खिलती,

जहां शिद्दत से रूह रूह से आज भी मिलती,

अगर यह सच है तो न करो ख़ुद को ज़ाया,

क्या करोगे यहाँ हासिल जब किसी और ने कुछ न पाया,

उल्टे पाँव लौट जाओ है जहां भी तुम्हारा ख़ुशनुमा वतन,

यहाँ कुछ नहीं बदलेगा, न करो तुम कोई यतन!”

अरुण भगत

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ख़ुद ही ख़ुद से हैं हारे हुए

*अहसास–ए–कमतरी के मारे हुए,

ख़ुद ही ख़ुद से हैं हारे हुए,

उन्हें कोई क्योंकर देगा शिकस्त,

जिनके हौंसले यूँही हैं पस्त,

अपनी नज़रों में जो ख़ुद को आंकें कम,

ओढ़ लें जो बेवजह के ग़म,

जिन पे कमतरी का गहरा साया है,

उन्हें कब कोई समझा पाया है,

ज़रूरी है ख़ुद में मुतमईन और भरा पूरा होना,

ताकि न पड़े ज़िंदगी के नायाब लम्हों को खोना,

लाज़िम है अपने पाँवों पे मज़बूती से खड़ा होना,

ताकि ख़ुशनुमा हो ज़िंदगी, न पड़े बेवजह रोना!

*inferiority complex(हीन भावना)

अरुण भगत

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ख़ुद ही ख़ुद को न जानूँ

अपनी जद्दो-ज़हद से से होकर सुर्ख़-रू,

मुद्दत बाद जब हुआ ख़ुद से रूबरू,

तो अपने अंदर इक अजनबी पाया,

ग़ज़ब उसके ढंग, अजब उसका साया,

ख़ुद से ख़ुद की दूरी का अजब ही है क़िस्सा,

कैसे इक नया ही शख़्स बन गया है मेरी रूह का हिस्सा,

मुख़्तलिफ़ उसका चेहरा, निराली उसकी चाल,

क्योंकर मैं ख़ुद ही न जानूँ ख़ुद का हाल,

कैसे बन गयीं हैं मन की नयी परतें,

नए जिनके ख़्वाब, नयी जिनकी शर्तें,

नए जिनके फ़साने, नए जिनके दर्द,

कैसी हैं ये चल रही हवाएँ जो हैं सर्द,

अंदर की दुनिया भी है बिलकुल निराली,

ख़ुद ही ख़ुद को न जानूँ, मैं बन गया सवाली!

अरुण भगत

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Listen When the Stars Tell Their Riveting Story

Listen when the universe to you does speak,

In awe at its vastness take a peek,

Listen when the stars tell their riveting story

Which is simply awesome and hoary,

Listen when the galaxies go singing their way,

Listen to the primordial sound so profound and gay,

Let the cosmic energy seep into your being,

Let it stir up your soul and impart a deeper way of seeing,

Go where the meandering rivers their way wend,

Receive the benedictions the towering mountains send,

Take a measure of the storms that rage,

And miraculously find yourself and your Maker on the same page!

Arun Bhagat

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फ़ौलाद है तूँ, कर फ़तह हासिल

न ग़म कर, न हो उदास,

है ज़िंदगी का अज़ीम तोहफ़ा तेरे पास,

ख़ुदा के वास्ते न कर इसे ज़ाया,

बड़ी मुश्किलों से इंसानी चोला तूने पाया,

ज़िंदगी का प्याला जी भर के पी,

न दम घोंट अपना, तूँ खुल के जी,

ख़ुद को ख़ुदा का अक्स जान कर,

अपनी सलाहियतों पे तूँ मान कर,

ज़र्रे-ज़र्रे पे तूँ लिख अपना नाम,

तेरे इस सफ़र में मायूसिओं का क्या काम,

अपनी नायाब नेमतों पे फ़ख़्र कर,

अहसासे कमतरी में न मर,

बन जाँबाज़ सिपाही जिसे शिकस्त नहीं गँवारा,

ग़ज़ब के हौंसलों ने जिसे है संवारा,

ज़िंदगी बेशक है इक दुश्वार जंग,

सफ़ेद से ज़्यादा स्याह हैं इस के रंग,

जब भी गिरे, उठ और आगे तूँ बढ़,

याद रख चेतन है तूँ, है नहीं इक जड़,

मुग़ालतों में न पड़, न हो ग़ाफ़िल,

फ़ौलाद है तूँ, कर फ़तह हासिल…

अरुण भगत

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कभी तो वो दिन आएगा

कभी तो वो दिन आएगा,

जब दिल दिल की राह पाएगा,

कभी तो देखेंगे वो सहर,

ख़ुदा की जब बरसेगी मेहर,

जब मोहब्बत न होगी रुसवा,

इंसानियत का परचम लहराएगा,

जब सच का होगा राज,

और झूठ का होगा पर्दाफ़ाश,

जब इंसाफ़ की तूती बजेगी,

जब अमन की बगिया सजेगी,

जब गुस्ताखी न होगी किसी की शान में,

कमी न होगी किसी के मान में,

जब इंसानी क़दरों का लोहा गढ़ेगा,

जब सच्चे का हौंसला बढ़ेगा,

जब जंगों की न होंगी बातें,

न होंगी नफ़रत की काली रातें,

तब सब ले हाथों में हाथ,

उजालों की और बढ़ेंगे साथ-साथ,

इक नयी ख़ुशनुमा ज़िंदगी की करेंगे शुरुआत,

ख़ुशबू जिसकी महकेगी, निराली होगी जिसकी बात!

अरुण भगत

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पर फैला के मैं उड़ जाऊँ

मैं आसमानों को छूने को बेक़रार,

असल तरक़्क़ी के लिए है यही दरकार,

पर फैला के मैं उड़ जाऊँ,

अपना मुस्तक़बिल रौशन कर पाऊँ,

यही मेरी चाह, यही मेरा अरमान,

और यही है ख़ुदा का फ़रमान,

जहां औरत की इज़्ज़त, वहीं फ़रिश्ते बसते,

उस माशरे के खुल जाते सब रस्ते,

काँधे से तुम्हारे काँधा मिला जो मैं चलूँ,

अपने सब जायज़ अरमान मैं पूरे करूँ,

जी पाऊँ बेख़ौफ़ चैन से ज़िंदगी,

न हो जिसमे कोई ज़ोर जबर और दरिन्दगी,

बन सकूँ वो गुल जिससे रौशन गुलज़ार हो,

न अंधेरों में ग़ुम मेरी ज़िंदगी बेज़ार हो,

यही वक़्त का है मिज़ाज, यही इंसाफ़ का है तक़ाज़ा,

और इसी से होगा क़ौम की इज़्ज़त में इज़ाफ़ा,

इसी से बनेगी यह दुनिया पुर अमन, पुर चैन,

और ख़ुशनुमा सुबह में तबदील होगी मायूस सी यह रैन!

अरुण भगत

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अपने वतन से प्यार कर

गणतंत्र दिवस पर अपने प्यारे देश के हर बाशिंदे के नाम यह पैग़ाम

अपने वतन से प्यार कर,

इस पे जाँनिसार कर,

जिसकी गोद में तूँ पला,

उसपे क्यों न हो फ़ख्र भला,

दिल से ख़िदमत इसकी कर,

जी भर के इस पे नाज़ कर,

जिस पाकीज़ा ख़ाक से तूँ बना,

हो जा उस ख़ाक पे फ़ना,

पीरों-फ़क़ीरों की यह ज़मीं,

किस बात की इसमें कमी,

ख़ुशक़िस्मती यह तूँ अपनी मान

कि तूँ है इसकी आन-बान,

जिसने तुझे है निखारा,

उसके आसमाँ का बन सितारा,

अमन-चैन का फहरा परचम,

दुनिया के ज़ख्मों पे लगा मरहम,

अपनी सरज़मीं का रौशन नाम कर,

कुछ कारगर करना चाहे अगर!

अरुण भगत

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इस लम्हे का कर तस्सवुर

गुज़रे वक़्त को न आवाज़ दे, वो न लौट कर आएगा,

इस लम्हे का कर तस्सवुर१,इसी में सब कुछ पाएगा,

माज़ी२ तो फ़ना हो गया, वक़्त के आग़ोश में सो गया,

जो बीत गया सो बीत गया, गए लम्हों में वो खो गया,

भूल जा उसकी ख़लिश३, नयी मंज़िलों की तलाश कर,

ज़िंदगी में मायनों के रंग भरना चाहता तूँ अगर,

ज़िंदगी बस यही है जो तेरे सामने खड़ी,

न इसके कुछ आगे न पीछे, ऐसी ही है यह कड़ी,

इसका एहतराम४ कर, अपने आग़ोश में इसे ले भर,

माज़ी मुस्तक़बिल५ की कश्मकश में न इसे बर्बाद कर,

यही वक़्त है, उड़ान भर, नए आसमानों में घर बना,

कौन है जो तुम्हें रोके, कौन कर सकता मना,

इस लम्हे को पुरज़ोर जी, यूँही न घुट-घुट के मर,

सारी कायनात६ है तेरी, जी भर के तूँ इसे प्यार कर!

१.ख़्याल, ध्यान

२.बीता वक़्त

३.चुभन

४.इज़्ज़त

५.आने वाला वक़्त

६.सृष्टि

अरुण भगत

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