मोहसिन हमारे साथ बड़ा हादसा हुआ,
हम रह गये, हमारा ज़माना चला गया
The above couplet by Mohsin Naqvi was the trigger for the poem below.
कहाँ चला गया वो ज़माना,
जब हर कोई था जाना पहचाना,
जहां प्यार की तरंगें बहती थीं,
जहां दिल में इंसानियत रहती थी,
जहां थोड़े में थे सब राज़ी,
नहीं था कोई बेवजह पाजी,
जहां भाई भाई को प्यारा था
उसकी आँखों का दुलारा था,
जहां बड़ों को छोटों का सहारा था,
कोई बड़ा-बूढ़ा न बेबसी का मारा था,
जहां दोस्त दोस्त का थे रखते मान,
एक दूसरे पर थे छिड़कते जान,
नीला अंबर, निर्मल पानी,
कोई न देखता लाभ और हानि,
कहाँ गए वे निर्मल मन,
कहाँ गए वे सरल जन,
किसने फ़िज़ाओं में ज़हर घोला है,
पैसे से सब कुछ तोला है,
यह कैसा ख़ुदपरस्ती का मेला है,
किस पागलपन का रेला है,
कहाँ खो गए प्यार के गीत,
कहाँ गया वह मधुर संगीत,
साँस-साँस को हो गए मोहताज़,
यह कैसी रिवायत, कैसा रिवाज़,
यह किस तरक़्क़ी का दौर है,
क्या यह नहीं काबिल-ए-गौर है?
अरुण भगत
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