कितने प्रश्न मुँह बायें खड़े हैं

कितने प्रश्न मुँह बायें खड़े हैं

उत्तर की माँग पर अड़े हैं,

ये सवाल वाक़ई हैं बहुत ढीठ,

न मोड़ सकते तुम उनसे पीठ,

सही-ग़लत न्याय-अन्याय की पूछते बात,

न ये देखें दिन और न ही देखें रात,

अनंत काल से ये यूँ ही अचल अडिग खड़े हैं,

इनको हल करते-करते हम कितने विवादों में पड़े हैं,

पर कहाँ पकड़ पाया है कोई सत्य-असत्य का छोर,

क्या किया है आपने कभी इस बात पर ग़ौर,

ये प्रश्न यूँ ही अधर में लटके रहेंगे,

तकते रहेंगे हमें और कुछ न कहेंगे,

पर ये हमें चैन से जीने भी नहीं देंगे,

यूँ ही प्रत्येक युग में हमारी परीक्षा लेंगे,

चाहे कितनी भी रही हो किसी समय की माँग,

इन शंकाओं का सागर कौन पाया है लांघ?

अरुण भगत

सर्वाधिकार सुरक्षित

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Live a Life that is Good and Right

One day your whole life will flash before your eyes,

So in living your life be prudent and wise,

Do not in any way accumulate follies and sin,

That way the battle of life you can never win,

If you are honest in earning your daily bread,

That is what will stand you in good stead,

If you do not any pettiness or chicanery come nigh,

You will be able to walk with your head held high,

If you do not swallow of the world any lowly bait,

If on the straight and narrow path you keep steady your gait,

If you do not give way to the distortions of the mind,

A whole lot of happiness and peace you will find,

At the end of the day you will have on your conscience no weight,

You can always live light and die light,

If you know how to live a life that is good and right!

Arun Bhagat

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इंसानियत को ग़र दिया गंवा

इंसानी क़दरों का पतन

न सह सकता कोई वतन

इन क़दरों को जो खो दिया

मानो विनाश का बीज बो दिया

भूल गए सही ग़लत का फ़रक

तो समझो हो गए हम गरक

बर्बादियों के रस्ते खुल जाएँगे

फिर कहाँ चैन हम पाएँगे

इंसानियत को ग़र दिया गंवा

सारी तरक़्क़ी हो जाएगी हवा

जब ग़ैरत हाथ से जाएगी

तो शर्मसारी की हाथ आएगी

समझ लें इस बात को

न हाथ सुझाई देगा हाथ को

ग़र रोशनी के सब रस्ते कर दिए बंद

और ज़मीर बेच कमा लिए सिक्के चंद

ये दौलत किस काम आएगी

ग़र अस्मत ही विदा हो जाएगी

अरुण भगत

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Alone We Walk on the Earth

Alone we come and alone we go,

Alone we walk on the earth,

Of truth in this there is no dearth,

Alone we all bear our yoke,

Sounds like a cosmic joke!

Alone we are in our woe and pain,

Alone in our loss and gain,

Alone in the vortex of love and hate,

We wage a lonely war against fate,

Alone we do iron into our soul pump,

Alone into the frightening abyss jump,

Alone we from one day into another tumble,

Alone we repeatedly err and fumble,

Alone we on the stage of life strut

Though wearied inside by the daily rut,

Vainly like Sisyphus rocks up the mountain we roll,

Alone we chase every weary dream, every illusionary goal,

As people wag their tongues and at us gawk ,

Alone into the sunset do we reluctantly walk!

Arun Bhagat

All rights reserved

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कैसी ये वहशत है

कैसी ये वहशत है

फ़िज़ाओं में भी दहशत है

दहकते अँगारे हैं आज ज़ुबानों पर

लगा पाया कौन पहरे बदगुमानों पर

उल्फ़त पर भी लग गए पहरे

न जाने ये दौर जा कहाँ ठहरे

दुआओं में भी जब नहीं रहा असर

इस माशरे में अब कैसे हो बसर

दरकते पहाड़ भी कुछ बोल रहे

हमारी करनी का हिसाब खोल रहे

कैसी ये अजब दुश्वारी है

इंसान ही इंसान पर भारी है

कैसा ये ख़ौफ़नाक मंज़र है

हर आँख सूनी दिल बंजर है

रगों में रुक गई गोया खून की रवानी

कैसा है ये जोश कैसी ये जवानी

अरुण भगत

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चाँद पर पहुँचा चंद्रयान

चाँद पर पहुँचा चंद्रयान ,

क्यों न हो हमें अभिमान,

चाँद पर तिरंगा लहराये,

क्यों न हर्ष से मन भर आए,

क्यों न अपने वैज्ञानिकों पर करें अभिमान,

राष्ट गौरव का वो बने हैं यान,

साइंसदान महिलाओं ने हैं दिखाए जौहर,

महिला शक्ति पर लगा दी अपनी मोहर,

देश ने एक नया आयाम पार किया है,

कुंठित भावनाओं पर वार किया है,

दुनिया हमें अब जानने लगी है,

हमारा लोहा मानने लगी है,

यूँही स्थापित करें नए कीर्तिमान,

राष्ट्र बने अधिक सक्षम, बलवान,

धरती माँ को भी इसी निष्ठा से सजाएँ संवारें,

तभी तो लगेगी सही सफलता हाथ हमारे!

अरुण भगत

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स्व से होता सब शुरू

कर भला तो हो भला,

टल जाएगी सब बला,

सर्व का कल्याण कर,

फिर किस बात का डर,

बना अच्छाई को अपनी ढाल,

फिर न होगा बाँका बाल,

चर -अचर में प्रभु को देख,

न निकाल कोई मीन-मेख,

विधि का है जो लेख,

उसमें प्रभु अनुकंपा देख,

तत्व ज्ञान की बन जा ख़ान,

सर्व जगत को अपना जान,

स्व से होता सब शुरू,

अंतर्मन को जान गुरु,

हर किसी से प्यार कर,

स्वयं का उद्धार कर!

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अरुण भगत

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हम निकल आए हैं इतना आगे और इतनी दूर

ज़मीन धँस रही है,

इमारतें ढह रही हैं,

बारिशें क़हर ढा रही हैं,

नदियाँ उफान पे हैं,

हर चीज़ उनमें बह रही है,

पहाड़ हिल गए हैं,

मानो ये सब मिल गये हैं,

जंगलों की भीषण आग

छेड़ रही है डरावने राग,

ये धंसते पहाड़,

यह मिट्टी में मिलती इमारतें

और उनमें दब गई चीखें,

यह उफनती नदियाँ,

ये जंगलों की बेक़ाबू आग,

ये सब कर रहे हैं क्या बयाँ,

क्या हमने दिया है सब गवाँ,

क्योंकर किसी पर दोष मढ़ें,

कर्म हमारे हैं सामने आ खड़े,

यह तरक़्क़ी की अंधी दौड़,

आगे दौड़ और पीछे चौड़,

ये लालच का सैलाब,

ये हमारी बदसलूकी बदगुमानी,

न जाने हमें कहाँ ले आयी है,

ये बात है हमारी आपसी,

क्या हो पाएगी यहाँ से कोई वापसी,

शायद ही फिर चैन की बंसी बजा पाएँ,

शायद ही दुनिया के गुलशन को फिर सजा पाएँ,

हम निकल आए हैं इतना आगे और इतनी दूर,

शायद ही वापसी का रास्ता रौशन कर पाए कोई नूर

अरुण भगत

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राख में अभी भी है इक चिंगारी

ख़्वाहिशों की राख में है अभी भी इक चिंगारी

कहाँ बुझती है हो जाने की चाहे लाख तैयारी

ख्वाहिशें दम नहीं तोड़तीं ता-ज़िंदगी

न वो पूरी हों न करने दें बंदगी

ख़्वाहिशों का सिलसिला भी बड़ा अजीब है

क्यों वो दिल के इतना क़रीब है

इक पूरी हो तो दूसरी उठाए सर

हर ख्वाहिश पे हम क्यों जाते हैं मर

इतने अरमान लेकर आख़िर कहाँ जाएँगे

कब इनसे दिल से निजात पाएँगे

कब तक हम रातों की नींद गवाएँगे

कब सबर और चैन का परचम फहरायेंगे

क्यों लगे यही ख़लिश ही है हमारी तक़दीर

कहाँ मिले ख़्वाहिशों को फ़ना करने की तदबीर

अरुण भगत

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वजूद में उनके साये गहरे

मुखौटों के पीछे छिपे लोग

न जाने पालें कितने रोग

बनावट की ज़िंदगी जिएँ

झूठ का रोज़ प्याला पिएँ

सच्च से रहते कोसों दूर

उनकी ज़िंदगी में कहाँ कोई नूर

कहाँ ख़ुशी कहाँ है चैन

जीवन उनका एक लंबी रैन

ज़मीर पे लगाएँ चाहे लाखों पहरे

वजूद में उनके साये गहरे

मुखौटों की भीड़ में ख़ुद ही खो जाते

ज़िंदगी से कोई नेमत नहीं है वो पाते

मुखौटों का भँवर लेता उन्हें नीचे खींच

जब सच्च को देख वो लेते आँखें भींच

मुखौटों के समुंदर में इंसान जब खो जाता

तो कहाँ उसको सकूँ , कहाँ वो सुख पाता

अपने अंतर्मन के सच्च को जो हैं जीते

जीवन का सुमधुर रस वही जन हैं पीते!

अरुण भगत

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