कैसी ये वहशत है

कैसी ये वहशत है

फ़िज़ाओं में भी दहशत है

दहकते अँगारे हैं आज ज़ुबानों पर

लगा पाया कौन पहरे बदगुमानों पर

उल्फ़त पर भी लग गए पहरे

न जाने ये दौर जा कहाँ ठहरे

दुआओं में भी जब नहीं रहा असर

इस माशरे में अब कैसे हो बसर

दरकते पहाड़ भी कुछ बोल रहे

हमारी करनी का हिसाब खोल रहे

कैसी ये अजब दुश्वारी है

इंसान ही इंसान पर भारी है

कैसा ये ख़ौफ़नाक मंज़र है

हर आँख सूनी दिल बंजर है

रगों में रुक गई गोया खून की रवानी

कैसा है ये जोश कैसी ये जवानी

अरुण भगत

सर्वाधिकार सुरक्षित

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Published by Arun Bhagat

I love to talk through my writings.@

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