क्यों?

ख़ाली हाथ आए,

ख़ाली हाथ जाना,

भाग मृगतृष्णाओं के पीछे

कुछ नहीं है पाना,

अटल सत्य से हम

सब दूर भागते,

रहते सोए,

कभी न जागते,

भ्रम में जीते,

भ्रम में मरते,

आलिंगन सत्य का

कभी न करते,

यूहीं दौड़ती

विकारों की गाड़ी,

यूहीं उलझाती

अज्ञानता की बाढ़ी,

यूहीं मद

सिर चढ़ कर बोलता,

पट ज्ञान के

कभी न खोलता,

यूहीं जीवन का

चलता मेला,

यूहीं खेलती

माया खेला,

क्यों नहीं हम

स्वयं को संवारते,

क्यों मानव जीवन की

दुर्लभता बिसारते,

क्यों?

अरुण भगत

सर्वाधिकार सुरक्षित

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मुझे गिला है उनसे

मुझे गिला है उनसे

जो सच को सच नहीं कहते

जो झूठ की मार को

चुप-चाप अनचाहे सहते

झूठ को जाने-अनजाने

वो देते बल

नहीं समझते कि

कड़वा होगा उसका फल

नहीं सोचते वो कि

झूठ का यूँ फैलेगा जाल

तो क्या होगी

हमारी गति, हमारा हाल

समय की यह माँग है कि

सच के साथ हों खड़े

अगर चाहते हम कि

लक्ष्य प्राप्त हों बड़े

सच को क्षीण करता

झूठ का हर वार

निस्तेज करती सच को

झूठ की हर मार

जान लें हम कि

यह है आर-पार की घड़ी

असत्य का छद्मजाल है

स्वयं में विपदा बड़ी

यदि समाज को देना चाहें हम

एक स्वस्थ दिशा

तो फिर छँट जानी चाहिए

असत्य की निशा

समय की यह पुकार है

सत्य को दें बल

अगर हम राष्ट्र- प्रहरी चाहें

मातृभूमि का स्वर्णिम कल

क्यों न हम यह मान लें

और लें यह जान

कि सत्य की नींव पर ही

खड़े होते राष्ट्र महान!

*जिन से मुझे गिला है उन में मैं स्वयं भी सम्मिलित हूँ

अरुण भगत

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आज से हर लम्हे को मनाते हैं

नये साल में नई सोच

आज से हर लम्हे को मनाते हैं

उसे अपने ख़्वाबों से सजाते हैं

सुरमई शाम से कुछ रंग चुराते हैं

उनसे अपनी क़िस्मत को लुभाते हैं

हर लम्हे को संवारना है हमारा फ़र्ज़

यह है ज़िंदगी का हम पर क़र्ज़

आओ इस क़र्ज़ को चुकातें हैं

उम्मीदों की शमा हर घर जलाते हैं

लम्हे में ही तो समाया है सब कुछ

इस बात को तुम जान लो सचमुच

लम्हों से ही तो है तारीख़ लिखी जाती

उन्हीं से सदियों की बुनियाद रखी जाती

लम्हों की कोख में ही है सब कुछ पलता

उन्हीं की बदौलत तो हर चिराग़ है जलता

लम्हों को ग़र अपनी बाहों में हम भर लें

उनकी बेपनाह अहमियत को घर कर लें

तो फिर रह जाएगा कुछ न पीछे न आगे

सुलझ जाएँगे पल में ही सब उलझे धागे

लम्हे की जानिब ग़र बढ़ाओगे अपने हाथ

सारी कायनात को खड़ा पाओगे अपने साथ

अरुण भगत

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नव वर्ष के लिए मंगल कामनाएँ! नव वर्ष आप सब के लिए शुभ, अर्थपूर्ण एवं आनन्दमय हो!

पल्लवित हों नई संवेदनाएँ

नया साल आएगा

ढेरों ख़ुशियाँ लाएगा

अंगड़ाई लेंगीं नयी उमंगें

उठेंगी मन में नयी तरंगें

अंतर्मन में बजेंगे ढोल-मंजीरे

खुल जाएँगी सब ज़ंजीरें

देखो वो अंधेरा गया

उग रहा है एक सूरज नया

ख़ुशी का परचम फहरायेगा

अंधेरा अब न गहराएगा

करो स्वागत एक नई सहर का

अब न डर हो किसी क़हर का

हर सुंदर सपने को करें साकार

आओ एक नई दुनिया को दें आकार

विषमताओं की कोई हो न जगह

मन बुझने की कोई हो न वजह

निष्कासित हों सब वेदनाएँ

पल्लवित हों नईं संवेदनाएँ

असत्य का हो मूल विनाश

हो सत्य का सर्वत्र प्रकाश

ऊसर धरती पर खिल जाएँ फूल

पथ पर न रह जाएँ कोई शूल

क्यों न हो जाएँ हम सब साथ

कदम बढ़ाएँ ले हाथों में हाथ

करें एक सर्वोत्तम दुनिया की रचना

जिस लिए हुई हमारी संरचना

अपनी नियति को साकार करें

स्व जीवन का उद्धार करें!

अरुण भगत

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माँ तो आख़िर माँ होती है

माँ की पुण्यतिथि पर उनकी पुण्य स्मृति को समर्पित

माँ तो आख़िर माँ होती है!

बच्चों में संस्कारों के बीज बोती है

ईसा समान है सूली पर चढ़ जाती

इसी में है परम् आनंद वह पाती

कौन भूल सका है उसका प्यार-दुलार

उसके मन की वात्सल्यमयी पुकार

उसके सुकोमल मातृत्व की छाया

जैसे एक विशाल बरगद का साया

माँ तो आख़िर माँ होती है!

माँ का मर्म तो माँ ही जाने

उसके मन के मृदु ताने-बाने

सृजन की वह शक्ति अपार

प्रेम सुधा का अमूल्य भंडार

हम सब ने है यह सदैव माना

मुश्किल है माँ जैसा बन पाना

उसके ह्रदय की थाह को पाना

माँ तो आख़िर माँ होती हैं!

चाहे हम हो जाएँ कितने खिन्न

कभी न उतार पाएँगे माँ का ऋण

अपनी माँ पर बलिहारी जाएँ

उसकी गोद में स्वर्ग को पाएँ

इसी बात पर कीजिए ग़ौर

जग में न है माँ जैसा और

और कहाँ पर पाइए ठौर

माँ तो आख़िर माँ होती है!

अरुण भगत

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जब कहानी ही बनना है इक दिन

आख़िर हम सब हैं महज़ कहानियाँ
फ़ख़्त वक़्त की रगों की रवानियाँ
जब कहानी ही बनना है इक दिन
और कोई चारा ही नहीं उस बिन
तो कहानी फिर होनी चाहिए ऐसी खूबसूरत
जैसे संग-ए-मरमर की दिलकश कोई मूरत
कोई सुनाए तो खूबसूरत हो अफ़साना
बरसों तक जिसे याद रखे ये ज़माना
ऐसी कहानी बनने को लगानी होगी जान
बनना होगा इंसानियत की आन-बान और शान
खड़ी करनी होगी सच की इक बुलंद मीनार
गिरा देनी होगी नफ़रत की हर दर-ओ-दीवार
फ़तह हासिल करनी होगी हर ऐब पर
बेमिसाल सा अफ़साना बनना चाहो ग़र
कहानी ऐसी बनो जिसे याद करें नसलें
जिस के रहते लहरा उठें अमन-ओ-चैन की फसलें

अरुण भगत
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सकूँ का कोई रस्ता ज़रूर निकलेगा

मिरे जुनूँ का नतीजा ज़रूर निकलेगा

इसी स्याह समुंदर से नूर निकलेगा

-अमीर कज़लबाश

अमीर कज़लबाश के इस उमदा कलाम से उपजी मेरी रचना

काले मायूस बादल का चीर सीना

मेरे हौंसलों का सूरज ज़रूर निकलेगा

चाहे लाख कोशिश कर ले ज़हालत

ज़ेहानत का कोई रस्ता ज़रूर निकलेगा

बीच बैचेन रूहों की इस कश्मकश के

सकूँ का कोई रस्ता ज़रूर निकलेगा

लाख मौत के मुँह में धकेले बदहाली

जीने का कोई रस्ता ज़रूर निकलेगा

ग़ुरबत के मारे इस अवाम के सदके

खुशहाली का रस्ता ज़रूर निकलेगा

मज़लूमों की जानिब ग़र बढ़ाओगे हाथ

दुआओं का दरिया ज़रूर निकलेगा

देखेंगे ग़र इंसाफ़ अमन-ओ-चैन का ख़्वाब

उसकी ताबीर का कोई रस्ता ज़रूर निकलेगा

अरुण भगत

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चलो बनाएँ इक नई दुनिया

चलो बनाएँ इक नई दुनिया

जिसमें गाती हो इक मुनिया,

मोहब्बतों के बजते हों ढोल-मंजीरे,

टूट चुकी हों सब ज़ंजीरें,

नफ़रतों के न बाज़ार गरम हों,

दिलों के अंदर एहसास नरम हों,

बजती हो बंसी अमन-चैन की,

रौशन सहर हर स्याह रैन की,

किरदार उमदा हो , इरादे नेक,

रश्क कर उठे ये मुआशरा देख,

जात-पात का न कोई फ़रक हो,

हवस के चलते न कोई गरक हो,

बेवजह खून न बहता हो जंगों में,

इज़ाफ़ा हो दिलख़ुश रंगों में,

बढ़ जाएँ आगे ले हाथों में हाथ!

तबदील होगा हक़ीक़त में ये ख़्वाब

जब कदम मिला सब चलेंगे साथ,

बन जाएगी इक नई दुनिया,

जिसमें गाएगी इक मुनिया,

मोहब्बतों के बजेंगे ढोल-मंजीरे,

टूट जाएँगी सब ज़ंजीरें!

अरुण भगत

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As Life Slips Through Our Fingers

As life slips through our fingers

And puts us through its various wringers,

We wonder which way will it wend

And where, Oh where!, will it all end.

But then the end is not ours for the asking,

The secret lies curled up with the gods in heaven basking,

It hangs tantalisingly somewhere up in the air,

It just won’t before us itself bare.

So from day to day with us the enigma walks,

In undecipherable language to us it talks

Till one day into our end do we unwittingly barge

As it stands before us looming large.

While with screaming protest our mind swarms,

It carries our unwilling souls into its arms

To a mysterious land where all is milk and honey,

I wonder why to me it sounds so delusional and so very funny!

Arun Bhagat

All rights reserved

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उस पुण्य धरा को करें नमन

शूल जहां चुभता नहीं

दीपक जहां बुझता नहीं

इरादे अटल पर्वत समान

गतिशीलता को नहीं विराम

गंगा का जहां सतत् प्रवाह

चैतन्य का है व्योम गवाह

हिमालय जहां गगन को चूमे

राम नाम पर जन-जन झूमे

जप- तप संयम जहां की रीत

घृणा-द्वेष पर भारी प्रीत

समस्त विश्व को कुटुंब जो माने

पवित्र-पावन कण-कण को जाने

जिसके आभूषण पुराण और वेद

जो नहीं करते किन्हीं दो में भेद

ह्रदय-वीणा की जहां धुन है सरल

कहाँ टिक पाए कोई गरल

प्रभु नाम की जहां चहूँ ओर लगन

उस पुण्य धरा को करें नमन!

अरुण भगत

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