जब कहानी ही बनना है इक दिन

आख़िर हम सब हैं महज़ कहानियाँ
फ़ख़्त वक़्त की रगों की रवानियाँ
जब कहानी ही बनना है इक दिन
और कोई चारा ही नहीं उस बिन
तो कहानी फिर होनी चाहिए ऐसी खूबसूरत
जैसे संग-ए-मरमर की दिलकश कोई मूरत
कोई सुनाए तो खूबसूरत हो अफ़साना
बरसों तक जिसे याद रखे ये ज़माना
ऐसी कहानी बनने को लगानी होगी जान
बनना होगा इंसानियत की आन-बान और शान
खड़ी करनी होगी सच की इक बुलंद मीनार
गिरा देनी होगी नफ़रत की हर दर-ओ-दीवार
फ़तह हासिल करनी होगी हर ऐब पर
बेमिसाल सा अफ़साना बनना चाहो ग़र
कहानी ऐसी बनो जिसे याद करें नसलें
जिस के रहते लहरा उठें अमन-ओ-चैन की फसलें

अरुण भगत
सर्वाधिकार सुरक्षित

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Published by Arun Bhagat

I love to talk through my writings.@

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