माँ तो आख़िर माँ होती है

माँ की पुण्यतिथि पर उनकी पुण्य स्मृति को समर्पित

माँ तो आख़िर माँ होती है!

बच्चों में संस्कारों के बीज बोती है

ईसा समान है सूली पर चढ़ जाती

इसी में है परम् आनंद वह पाती

कौन भूल सका है उसका प्यार-दुलार

उसके मन की वात्सल्यमयी पुकार

उसके सुकोमल मातृत्व की छाया

जैसे एक विशाल बरगद का साया

माँ तो आख़िर माँ होती है!

माँ का मर्म तो माँ ही जाने

उसके मन के मृदु ताने-बाने

सृजन की वह शक्ति अपार

प्रेम सुधा का अमूल्य भंडार

हम सब ने है यह सदैव माना

मुश्किल है माँ जैसा बन पाना

उसके ह्रदय की थाह को पाना

माँ तो आख़िर माँ होती हैं!

चाहे हम हो जाएँ कितने खिन्न

कभी न उतार पाएँगे माँ का ऋण

अपनी माँ पर बलिहारी जाएँ

उसकी गोद में स्वर्ग को पाएँ

इसी बात पर कीजिए ग़ौर

जग में न है माँ जैसा और

और कहाँ पर पाइए ठौर

माँ तो आख़िर माँ होती है!

अरुण भगत

सर्वाधिकार सुरक्षित

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Published by Arun Bhagat

I love to talk through my writings.@

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