मानवता का यह कैसा रूप?

किसे फ़िक्र दुनिया कहाँ खड़ी

सबको अपनी-अपनी हैं पड़ी,

अपनी तूती सभी बजायें,

अपनी दुकान सभी सजायें,

अपना शंख नाद स्वयं ही करते,

अपने गुणों का दम ख़ुद ही भरते,

अपने मोहपाश में ख़ुद ही जकड़े,

खड़े अहम् का दामन पकड़े,

दंभ जिनके सिर चढ़ कर कर बोले,

उनके ज्ञान चक्षु कोई कैसे खोले,

उल्टी हो गई जगत की रीत,

कहाँ प्रेम है, कहाँ है प्रीत,

कहाँ उल्लास है, कहाँ है हर्ष,

दिल जैसे हो गये ठंडे फ़र्श,

हम सब भटकें रीते-रीते,

किसी के ज़ख़्म कहाँ हैं सीते,

लुप्त हुई मीठी रिश्तों की धूप,

मानवता का यह कैसा रूप?

अरुण भगत

सर्वाधिकार सुरक्षित

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Published by Arun Bhagat

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