स्वयं को करो सिद्ध

चलो उठो, हाथ बढ़ा कर छू लो,

यह विस्तृत गगन तुम्हारा है,

इसी सोच ने बहुतेरों का जीवन संवारा है,

चलो, हो जाओ लहरों पर सवार,

दिखता है दूर जो क्षितिज, वह भी तो तुम्हारा है,

आगे बढ़ने वालों को रुकना कहाँ गवारा है?

चंद्रमा के घोड़े पे सवार बढ़ जाओ तारों की ओर,

कौन जाने कहाँ ले जाए तुम्हें तुम्हारे जीवन की डोर?

मेघ आच्छादित अम्बर में दामिनी की भाँति जाओ कौंध,

सत्य को बल दो और असत्य को दो रौंद,

जीवामृत का पान कर हो जाओ अजर अमर,

विजयी उद्घोषित करे तुम्हें जीवन समर,

शीर्ष हो ऊसर और तेजोमय ललाट हो,

खुल जाएँ तुम्हारे लिए जो भी बंद कपाट हों,

हो सवार असीमित सम्भावनाओं के रथ पर,

स्वयं को करो सिद्ध, बढ़ जाओ श्रेष्ठता के पथ पर!

अरुण भगत

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Published by Arun Bhagat

I love to talk through my writings.@

14 thoughts on “स्वयं को करो सिद्ध”

  1. अद्भुत, एक मार्गदर्शक कविता ❤️❤️❤️🥰🥰🥰 love you sir 😊

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    1. आपके प्रेम और आपकी सराहना के लिए बहुत बहुत धन्यवाद, भोला जी! खुश रहिए!

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  2. अति सुंदर! आपकी कविता ने तो हर पाठक को झंगझोड़ दिया! आपकी कविता तो हर आपदा तथा विपरीत स्तिथि को ललकार देने के लिये प्रेरित करती है! जय हो।

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    1. धन्यवाद, भाई! जीवन विषम परिस्थितियों से साहसपूर्वक लड़ने और अपनी सम्भावनाओं को मूर्त रूप देने का ही तो नाम है।

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  3. बहुत ही शानदार,जानदार और प्रेरणादायक कविता👍💫👏✍️🌺😇..सर!🙏

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    1. आपकी ओजस्वी प्रतिक्रिया और प्रशंसा के लिए बहुत बहुत धन्यवाद, श्वेता जी! जीती रहिए!

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद, ममता जी! यह आवश्यक है कि हम सब एक दूसरे के लिए प्रेरणा स्त्रोत बनें।

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