विषमताओं से हम साथ लड़ें
हर कसौटी पर उतरें खरे,
साथ ही खिलें सबके मन,
साथ ही चलें सब जन,
साथ ही मन उपवन महकें,
सदा जहां प्रेम कोकिला चहके,
साथ ही बुनें सामाजिक ताना बाना,
साथ ही बैठना, साथ ही खाना,
साथ ही करें राष्ट्र निर्माण, बनें राष्ट्र गौरव,
साथ ही हों उदीयमान, साथ ही बनें सौरव,
साथ ही करें उस विश्व का ध्वजारोहण,
जहां कोई न करता हो किसी का दोहन,
साथ ही बनें यशस्वी, साथ ही कीर्तिमान हों,
साथ ही हों गौरवान्वित, किंचित मात्र न अभिमान हो,
न हो कहीं दुराग्रह, न दुराचार हो,
प्रेम बसता हो सर्वत्र, सदाचार का प्रसार हो,
हाथों में हाथ लिए बढ़ें एक नव क्षितिज की ओर,
मंगलमय हो सब का जीवन, शुभ आशीष दे एक नूतन भोर !
अरुण भगत
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