यह वक़्त का रेला,
यह ज़िंदगी का मेला,
तूँ ख़त्म हो चुकेगा,
फिर भी यह न रुकेगा,
न रहेंगे बाग़ और बाग़बान,
फिर भी चलता रहेगा यह कारवाँ,
हम सभी वक़्त की गर्द में जाएँगे खो,
इक गहरी नींद जाएँगे सो,
वक़्त का दरिया तो यूँ ही बहता रहेगा,
अपनी ख़ामोश ज़ुबान में बहुत कुछ कहता रहेगा,
मदमस्त हम, वक़्त रहते कहाँ कुछ सुनेंगे,
कहाँ हम थमेंगे, कहाँ कुछ गुनेंगे?
कितना भी हो गुमान, वक़्त का रेला तो ले जाएगा बहा,
पता भी नहीं होगा, हो जाएँगे हवा,
हमें हो या न हो मंज़ूर,
यही ज़िंदगी का अदब, यही दस्तूर!
वक़्त का हिसाब तो है सीधा और साफ़,
न कभी किया है, न कभी करेगा हमारी गुस्ताखियों को माफ़!
अरुण भगत
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