प्रतिदिन सपने लेते आकार,
उनमें से कुछ ही होते साकार,
बहुत से समय की गर्त में जाते खो
जैसे बुझ जाए जलती हुई कोई लौ,
पर होते हैं कुछ ऐसे अपूर्ण सपने
जो लगें हमें बहुत अपने,
वे रह जाते बन कर एक टीस मन में
जैसे चुभता हो कोई शूल तन में,
ज़िंदगी में चाहे कितनी भी तय कर लें दूरी,
कहाँ होती हैं सब इच्छाएँ, सब ख्वाहिशें पूरी,
कौन नहीं चाहता बादलों पर तैरते चाँद को पकड़ना,
कौन नहीं चाहता हाथों से जाती हर ख़ुशी को बाहों में जकड़ना,
पर कब कहाँ हो पाता है यह सब,
कहाँ सौंपता है हमारे हाथों में जगमगाते सितारे यह नभ ?
कितने भी मारे हाथ पैर , कितने भी कर लें यतन ,
यूँ ही ज़िंदगी की अधूरी कहानी एक दिन हो जाती खतम !
अरुण भगत
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