अगर ग़रूर न करते
तो बेमौत न मरते,
न होती हमारे ज़मीर की ज़मीं बंजर,
न होता बेनूर और बेरौनक़ यह मंज़र!
न फ़िज़ा में घुलता यह जानलेवा ज़हर,
न बरपाते इक दूजे पे यूँ क़हर,
न बनते इक दूजे की बर्बादी की वजह,
न देते लम्हों में सदियों की सी सज़ा!
ग़र ग़रूर और ख़ुद्दारी में फ़र्क़ कर पाते
तो यूँ दुनिया से रुसवा हो कर न जाते,
फिर शायद इस जमीं पर अमन और चैन होता,
और मुहब्बत के अनमोल ख़ज़ाने को कोई यूँ बेवजह न खोता!
फिर शायद यह दुनिया ही जन्नत होती,
और हर रिश्ता होता इक नायाब मोती!,
फिर ज़र्रे ज़र्रे में ही दिखता खुदा का नूर,
और इन्सान होता न इन्सान से मीलों दूर!
अरुण भगत