यह संसार है एक सपना,
क्षणभंगुर है जो भी लगे अपना!
ज़िंदगी रेत सी हाथों में से छनती जाती
पर यह बात सुनने में है किसको भाती?
न जाने यह बुलबुला कब फूट जाए,
साँसों की लड़ी कब टूट जाए,
कब जीवन की गाड़ी अपने आख़िरी पड़ाव पर रुक जाए,
ज़िंदगी मौत के आगे झुक जाए,
कब इस सुबह की हो जाए शाम,
जो कुछ ख़ास नहीं, रोज़ होने वाली है बात आम!
सारी ज़िंदगी हम निजी अमरत्व के झूठ को पकड़ बैठे रहते,
सच जानते हैं पर खुद को भी नहीं कहते,
यह छलावा लगे हमें प्यारा कि हम तो यूँ ही जिए जाएँगे,
ज़िंदगी के कशिश भरे जाम यूँ ही पिए जाएँगे!
क्यों करते रहते हैं हम ऐसा,
क्यों सच को नहीं देखते वह है जैसा?
क्योंकि जानते हैं कि ज़िंदगी के बाद है एक शाश्वत मौन,
फिर किस लम्बे सफ़र पर निकलना है यह जाने कौन?
फिर कोई सफ़र है भी या नहीं, यह कौन जाने?
यह है तो एक गहरा राज़, कोई माने या न माने!
कौन सुलझा पाया है ये उलझे हुए ताने बाने?
अरुण भगत