ग़लतफ़हमियों के क़िस्से कितने दिलचस्प हैं,
हर ईंट यह सोचती है कि दीवार मुझ पर टिकी है!
ख़ुदा सोचता है वह कायनात को चला रहा है,
इंसान सोचता है कि वह ख़ुदा को चला रहा है!
मैं सोचता हूँ कि मैं हूँ संसार का केंद्र बिंदु,
तुम सोचते हो कि तुम हो सप्त सिंधु!
दिल सोचता है कि उससे बड़ा कोई नहीं,
दिमाग़ सोचे कि उसके बिना खड़ा कोई नहीं!
हाड़ मांस का पुतला सोचे कि वह दुनिया को है नचाए,
अपने क्षणभंगुर वर्चस्व का गली गली में शोर है मचाए!
गुरु सोचे कि वह शिष्य को दिशा दिखाए,
शिष्य सोचे कि वह गुरु की गरिमा को है बढ़ाए!
नेता सोचें वे समाज के हैं नायक,
और अभिनेता माने खुद को सदी के महानायक!
माँ सोचे कि वह परिवार को है चलाए,
पिता है कि अपना लोहा मनवाए!
माँ बाप सोचें कि वे हैं बच्चों के जीवन दाता,
बच्चे मानें खुद को अपने भाग्य के विधाता!
ख़ुशफ़हमियों की यूँ ही बिछी रहे बिसात,
अहम अपना पासा फेंके और दे दे सबको मात!
इसी से बनते ग़लतफ़हमियों के न ख़त्म होने वाले क़िस्से,
और सिर्फ़ और सिर्फ़ छलावा ही आता इंसान के हिस्से!
अरुण भगत