गुरु बिन कौन दे ज्ञान,
गुरु बिन कैसे हो सत्य की पहचान,
गुरु बिन कौन जो पार लगाए,
और सच का है अर्थ सिखलाए,
गुरु बिन कैसे हो गति,
गुरु बिन कौन दे सके है सन्मति?
गुरु बिन नाहीं कोई ठौर,
गुरु हैं जीवन पतंग की डोर!
गुरु देत संस्कार की निधि,
गुरु बतलाते जीवन की विधि,
तिमिर का कर देते वे नाश,
चहुं ओर हो जाता प्रकाश!
गुरु हैं जैसे ठंडी छाँव,
क्यों न लगिए उनके पाँव?
अपने गुरु पे बलिहारी जाएँ,
गोविंद से जो हैं मिलाएँ!
गुरु के करते जो गुण गान,
होते यशस्वी, पाते मान,
गुरु की शरण में जो जाते,
शाश्वत सत्य की निधि वे पाते!
अरुण भगत
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