यूँ न बेवजह घुट घुट के मरो

प्यार से इक दूजे को मिलो,

और फूलों की तरह खिलो,

इक दूजे का एहतराम करो,

यूँ न बेवजह घुट घुट के मरो,

यूँ न बेशक़ीमत ज़िंदगी को करो ज़ाया,

न पड़ने दो इस पे इस पे अपनी खुदगर्जियों का साया,

अपनी वीरानियों से खुद को आज़ाद करो,

यूँ न बेमक़सद मौत से पहले मरो!

ज़िंदगी न मिलेगी दुबारा,

फिर क्यों नहीं है तुम्हें ये गवारा?

बड़ी मशक़्क़त के बाद पाया है जिसे,

जियो खुल कर प्यार और एतबार से इसे,

कौन जाने फिर किसी से कोई मिले या न मिले ?

फिर किस बात के शिकवे और गिले ?

अरुण भगत

Published by Arun Bhagat

I love to talk through my writings.@

13 thoughts on “यूँ न बेवजह घुट घुट के मरो”

  1. बेहद सुंदर कविता है सर । इतनी मुश्किल से हमें ये जीवन मिला है तो हम इसे खुल के जीना चाहिए।

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    1. बिलकुल अच्छे से खुल के जीना चाहिए, राशी! अगर कविता सुंदर लगी है तो ज़िंदगी को भी उसी सुंदरता से जीना चाहिए!

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