सच की राह पे चल और जी तूँ शान से,
फिर कौन है जो खेल पाए तेरी आन से?
सच को ही जी और झूठ का विष न पी,
झूठ के विषपान ने बहुतेरों की है जान ली!
अपने प्रभु से, अपने इष्ट से इतना बल तूँ माँग
कि असत्य के कुचक्र को तूँ सके हैं लांघ!
जब भी देख झूठ और प्रपंच का बादल गहरा,
जुटा अपनी हिम्मत और सच की पताका फहरा!
याद रख जहां झूठ के तो पाँव नहीं होते,
वहाँ सत्य के सब सदैव चरण हैं धोते!
सत्य को सब स्मरण करते, सत्य ही अजर अमर,
सत्य ही है जीतता जब असत्य से होता समर!
सत्य ही तो है सत्य में जीवन का केंद्र बिंदु,
सत्य की नौका ही तो पार कराती है भव सिंधु!
सत्य का कवच पहन निकल जब असत्य की हो काली रात,
सत्य ही है प्राण रक्षक जब लगा के असत्य बैठा हो घात!
अरुण भगत
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