जीवन की हर गिरह जो खोली
तो वह मुस्कुरा के बोली,
जितना गहरा भी तूँ जाएगा,
जीवन की थाह न पाएगा!
जीवन है अथाह सागर,
न समेट पाए इसे कोई गागर!
यह है अनंत और विशाल,
इसे ले खड़े हैं कई सवाल!
हर जवाब में हैं कई और सवाल,
ऐसा ही है जीवन, मन में न रख कोई मलाल!
जीवन है विशाल और हम हैं गौण,
शायद जान पाएँ कुछ रह कर मौन!
न मचा बवाल, न पाल कोई भ्रम,
मैं को दे निकाल तो पाएगा हर ओर ब्रह्म!
ब्रह्म से उपजी यह सृष्टि, ब्रह्म में ही होगी लीन,
स्वयं को यूँ जान जैसे अपार सागर में हो मीन!
एक जीवाणु के सामने समस्त विज्ञान है मुँह बायें खड़ा,
कौन है जीता अगर नियति से है वह लड़ा?
मौन में है ध्यान और ध्यान में है ज्ञान,
यही शाश्वत सत्य है, यही जीवन विज्ञान!
अरुण भगत