प्रकाश पुंज बन

जीवन की चुनौतियों का कर सामना डट कर,

व्यवहार क्यों न हो तेरा कुछ हट कर!

बाधाओं को वीरता से पार कर,

उन से डर डर के यूँ बेवजह न मर!

बढ़ा चल निरंतर नए क्षितिजों की ओर,

देख, प्रतीक्षा करती तेरी नित्य एक नयी भोर!

जीवन के उन्माद में तूँ लिप्त न हो,

बन वह सदैव तटस्थ रहे है जो!

जीवन मंच पे तेरी भूमिका हो सशक्त,

पर मोहपाश में न बाँध और न ही हो आसक्त!

पूर्ण न्याय कर अपने निर्धारित पात्र के साथ,

करता रहेगा जो संकोच तो कुछ न लगेगा हाथ!

उन्मुक्त हो कर स्थापित नित्य नए कीर्तिमान,

अभिमान न कर, पर रख सदैव जीवंत अपना स्वाभिमान!

आलिंगन कर जीवन की असीमित संभावनायों का,

देवलोक से अमृत को नीचे धरा पर ला!

प्रकाश पुंज बन धरती को प्रकाशमान कर,

ईश्वर तत्व है तूँ, फिर तुझे किस बात का है डर?

अरुण भगत

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Published by Arun Bhagat

I love to talk through my writings.@

22 thoughts on “प्रकाश पुंज बन”

  1. Thank you so much sir for sharing your beautiful poem with us. It inspired us alot to go ahead without any hesitation and fear.

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  2. बहुत बहुत धन्यवाद इस खूबसूरत कविता के लिए सर । हमें बहुत हिम्मत मिलती है आपके इन विचारों से सर । आपका आशीर्वाद हमारे साथ है है अगर तो हम हर कठिनाई को अवश्य ही पार कर जाएंगे ।

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  3. अति सुंदर, प्रोफेसर साहब! आपकी कविता ऊर्जा से परिपूर्ण है तथा सबके लिया अत्यन्त प्रेरणा दायक है।

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