अगर ग़रूर न करते

अगर ग़रूर न करते

तो बेमौत न मरते,

न होती हमारे ज़मीर की ज़मीं बंजर,

न होता बेनूर और बेरौनक़ यह मंज़र!

न फ़िज़ा में घुलता यह जानलेवा ज़हर,

न बरपाते इक दूजे पे यूँ क़हर,

न बनते इक दूजे की बर्बादी की वजह,

न देते लम्हों में सदियों की सी सज़ा!

ग़र ग़रूर और ख़ुद्दारी में फ़र्क़ कर पाते

तो यूँ दुनिया से रुसवा हो कर न जाते,

फिर शायद इस जमीं पर अमन और चैन होता,

और मुहब्बत के अनमोल ख़ज़ाने को कोई यूँ बेवजह न खोता!

फिर शायद यह दुनिया ही जन्नत होती,

और हर रिश्ता होता इक नायाब मोती!,

फिर ज़र्रे ज़र्रे में ही दिखता खुदा का नूर,

और इन्सान होता न इन्सान से मीलों दूर!

अरुण भगत

Published by Arun Bhagat

I love to talk through my writings.@

22 thoughts on “अगर ग़रूर न करते”

    1. धन्यवाद, साहिल प्यारे! आपका बेहतरीन कहना आपकी बेहतरीन सोच दर्शाता है!

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  1. बहुत ख़ूब, प्रोफेसर साहब। जहाँ एक ओर ग़रूर अशांति और तबाही के मंज़र की तरफ ले जाता है, वहां नम्रता आपकी ज़िन्दगी को सरल और शांतिमय बनाती है।

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    1. हार्दिक अभिनंदन और धन्यवाद, जोगेश भाई! काश जो आप कह रहे हो वह हम समझ पाते!

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  2. वाह जी वाह… “अगर गुरूर और खुद्दारी में फर्क समझ पाते”… बहुत खूब, भाई

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद, सनी भाई! अगर हम वाक़ई चीज़ों में फ़र्क़ समझ पाते तो क्या बात थी!

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