खुद से क्या चाहिए मुझे
मैं खुद ही न जानूँ,
है दिल में कोई ख़लिश,
मैं खुद ही न मानूँ,
बे नूर सा क्यों लगे मंज़र,
कौन है यह जाने,
म्यानों से बाहर निकले हैं ख़ंजर,
हवा में हैं गिले-शिकवे और ताने,
इंसान इंसान से पाले वैर,
हर कोई लगे है ग़ैर,
फ़िज़ा में घुल गया है ज़हर,
ख़ौफ़ज़दा से रहें हम आठों पहर,
हम तो चले थे बनाने दुनिया को जन्नत,
इस बेज़ार ज़िंदगी की तो न माँगी थी मन्नत,
यह वक़्त हमें कहाँ ले आया,
इस तरक़्क़ी से क्या है हमने पाया
जिसने अपनों को अपनों से कर दिया जुदा,
कैसा अजब सा बन गया है यह मु’आशरा , ए ख़ुदा,
चलने लगी हैं कैसी यह खुश्क हवाएँ
जिनमें न सुनायी दें किसी को किसी की सदाएँ,
ए रब, हमें ले चल उस दुनिया में वापिस,
जहां एहसास थे ज़िंदा और अख़लाक था हाफ़िज़,
जहां ख़ुदा का था बड़ा करम,
जहां रूहें थी रौशन और दिल थे नरम!
अरुण भगत
सर्वाधिकार सुरक्षित
#arunbhagatwrites#poetry# poeticoutpourings#outpouringsof myheart#writer#Indianwriter#englishpoetry#hindipoetry