अपना दर्द खुद से बाँटें,
खुद ही चुनें राह के काँटे,
खुद ही सिएँ अपना चाक सीना,
सीखें खुद ही के साथ जीना,
खुद ही ज़ख्मों पे मरहम लगाएँ,
खुद ही बलाओं को दूर भगाएँ,
खुद ही करें खुद का मुआयना,
खुद ही दिखाएँ खुद को आईना,
कौन आएगा तुम्हारा हाथ थामने,
कौन आएगा तुम्हारा हाल जानने,
कौन आएगा तुम्हें सकूँ देने,
कौन आएगा तुम्हें आग़ोश में लेने,
किस को अब फ़ुरसत अपने दीदार से,
क्या लेना किसी को अब विसाल ए यार से,
सब अब खुद को ही भरमा रहे,
खुद की तारीफ़ खुद से ही फ़रमा रहे,
तुम भी अब पकड़ो अपनी राह,
न रखो किसी से कुछ पाने की चाह!
अरुण भगत
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