स्व से होता सब शुरू

कर भला तो हो भला,

टल जाएगी सब बला,

सर्व का कल्याण कर,

फिर किस बात का डर,

बना अच्छाई को अपनी ढाल,

फिर न होगा बाँका बाल,

चर -अचर में प्रभु को देख,

न निकाल कोई मीन-मेख,

विधि का है जो लेख,

उसमें प्रभु अनुकंपा देख,

तत्व ज्ञान की बन जा ख़ान,

सर्व जगत को अपना जान,

स्व से होता सब शुरू,

अंतर्मन को जान गुरु,

हर किसी से प्यार कर,

स्वयं का उद्धार कर!

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अरुण भगत

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हम निकल आए हैं इतना आगे और इतनी दूर

ज़मीन धँस रही है,

इमारतें ढह रही हैं,

बारिशें क़हर ढा रही हैं,

नदियाँ उफान पे हैं,

हर चीज़ उनमें बह रही है,

पहाड़ हिल गए हैं,

मानो ये सब मिल गये हैं,

जंगलों की भीषण आग

छेड़ रही है डरावने राग,

ये धंसते पहाड़,

यह मिट्टी में मिलती इमारतें

और उनमें दब गई चीखें,

यह उफनती नदियाँ,

ये जंगलों की बेक़ाबू आग,

ये सब कर रहे हैं क्या बयाँ,

क्या हमने दिया है सब गवाँ,

क्योंकर किसी पर दोष मढ़ें,

कर्म हमारे हैं सामने आ खड़े,

यह तरक़्क़ी की अंधी दौड़,

आगे दौड़ और पीछे चौड़,

ये लालच का सैलाब,

ये हमारी बदसलूकी बदगुमानी,

न जाने हमें कहाँ ले आयी है,

ये बात है हमारी आपसी,

क्या हो पाएगी यहाँ से कोई वापसी,

शायद ही फिर चैन की बंसी बजा पाएँ,

शायद ही दुनिया के गुलशन को फिर सजा पाएँ,

हम निकल आए हैं इतना आगे और इतनी दूर,

शायद ही वापसी का रास्ता रौशन कर पाए कोई नूर

अरुण भगत

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राख में अभी भी है इक चिंगारी

ख़्वाहिशों की राख में है अभी भी इक चिंगारी

कहाँ बुझती है हो जाने की चाहे लाख तैयारी

ख्वाहिशें दम नहीं तोड़तीं ता-ज़िंदगी

न वो पूरी हों न करने दें बंदगी

ख़्वाहिशों का सिलसिला भी बड़ा अजीब है

क्यों वो दिल के इतना क़रीब है

इक पूरी हो तो दूसरी उठाए सर

हर ख्वाहिश पे हम क्यों जाते हैं मर

इतने अरमान लेकर आख़िर कहाँ जाएँगे

कब इनसे दिल से निजात पाएँगे

कब तक हम रातों की नींद गवाएँगे

कब सबर और चैन का परचम फहरायेंगे

क्यों लगे यही ख़लिश ही है हमारी तक़दीर

कहाँ मिले ख़्वाहिशों को फ़ना करने की तदबीर

अरुण भगत

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वजूद में उनके साये गहरे

मुखौटों के पीछे छिपे लोग

न जाने पालें कितने रोग

बनावट की ज़िंदगी जिएँ

झूठ का रोज़ प्याला पिएँ

सच्च से रहते कोसों दूर

उनकी ज़िंदगी में कहाँ कोई नूर

कहाँ ख़ुशी कहाँ है चैन

जीवन उनका एक लंबी रैन

ज़मीर पे लगाएँ चाहे लाखों पहरे

वजूद में उनके साये गहरे

मुखौटों की भीड़ में ख़ुद ही खो जाते

ज़िंदगी से कोई नेमत नहीं है वो पाते

मुखौटों का भँवर लेता उन्हें नीचे खींच

जब सच्च को देख वो लेते आँखें भींच

मुखौटों के समुंदर में इंसान जब खो जाता

तो कहाँ उसको सकूँ , कहाँ वो सुख पाता

अपने अंतर्मन के सच्च को जो हैं जीते

जीवन का सुमधुर रस वही जन हैं पीते!

अरुण भगत

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जब जाए तो चैन से जाए

डर-डरके क्यों जीता है

ज़हर ख़ौफ़ का क्यों पीता है

तय है इक दिन तो मरना

फिर घड़ा पाप का क्यों भरना

ज़िंदगी तो है इक सपना

यहाँ नहीं है कोई अपना

फिर नेह क्यों लगाता है

ख्याली पुलाव पकाता है

क्यों फँसता किसी फंदे में

क्या रखा गोरखधंधे में

कुछ देर का ही यहाँ बसेरा

शायद न देखें कल का सवेरा

फिर क्यों तिल-तिल मरता है

दमड़ी-दमड़ी के लिए लड़ता है

गौर तो फ़रमा तू ज़रा

सब यहीं रह जाएगा धरा

चिड़िया फुर्र से उड़ जाएगी

ख़ाक यहाँ पे रह रह जाएगी

ख़ुद को ख़ाकसार ही जान

सब कुछ यहाँ भरम ही मान

अपनी बंद आँखों को खोल

सिर्फ़ हों तेरे सच्चे बोल

नेकी को अपना साथी बना

अपनी हिरस को करदे फ़ना

अपने को अदना ही जान

इलाही रहमत को सब कुछ मान

ताकि इस दुनिया में सकूँ पाये

और जब जाए तो चैन से जाए!

अरुण भगत

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Before You Become A Story

Play your part well,

Do not on pettiness dwell,

Bathe yourself in glory

Before you become a story!

Do not let shoddiness your psyche scar,

Do not be with yourself at war,

Do not your fair name tar

Before you become a story!

Do not act puny and small,

Let not insidious ego hold you in thrall,

Do not at things contrary snarl

Before you become a story!

Do not give way to consuming rage,

Accept those not on the same page,

Do not war against them wage

Before you become a story!

Spread your aroma wherever you go,

The door to ensnaring temptations show,

Towards the ocean of enlightenment row

Before you become a story!

You are destined to become a story,

That is the truth final and hoary,

So before you are swept away by life’s gale,

Make sure to become a fascinating tale!

Arun Bhagat

All rights strictly reserved

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माँ तो आख़िर माँ है

माँ तो आख़िर माँ है,

अपने बच्चों में उसकी जाँ है,

बच्चे होते टुकड़े माँ के जिगर के,

वो है बसती उनकी नस-नस में,

माँ है तो सारा जहां है,

जहां माँ, जन्नत वहाँ है,

माँ ने है बच्चों को ज़ाया,

उनके लिए है वो घना साया,

राहत दे माँ की पुकार,

जैसे गर्मी में बारिश की फुहार,

उसकी ममता का नहीं कोई सानी,

छोटी लगे उसे अपनी हर क़ुर्बानी,

माँ तो बेशक है ख़ुदा का अक्स,

गुस्ताखियाँ बच्चों की देती सब बख्श,

माँ दुनिया की दौलत सबसे नायाब,

माँ की ख़िदमत सबसे बड़ा सवाब!

अरुण भगत

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क्या आदमी था वो

क्या आदमी था वो,

सच के लिए लड़ मर सकता था,

सौ झूठों पे भारी पड़ सकता था,

क्या आदमी था वो,

कितने उसकी साफ़गोई का दम भरते थे,

उसकी पाकीज़गी पे मरते थे,

क्या आदमी था वो,

सारी कायनात से प्यार करता था,

ज़ुल्मो-जब्र के ख़िलाफ़ लड़ता था,

क्या आदमी था वो,

अपनी हर बुराई पे उसने वार किया,

ख़ुद से खुदाई तक का फ़ासला पार किया,

क्या आदमी था वो,

हर किसी को माना अपनी रूह का हिस्सा,

और यूँ रौशन किया इंसानियत का क़िस्सा,

क्या आदमी था वो,

जंग-ए -ज़िंदगी में हौंसले की ज़िंदा मिसाल था,

किरदार ओर जाँबाज़ी का उसके ज़हन में क्या विसाल था,

क्या आदमी था वो,

ज़िंदगी जीने का सलीका हमें सिखा गया,

चलने के लिए मुक़द्दस राहें हमें दिखा गया,

क्या आदमी था वो!

अरुण भगत

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प्रेम में है वह शक्ति अपार

कितनी सुंदर प्रेम की भाषा,

संचरित करती उमंग और आशा,

प्रेम से वन- उपवन महकें,

नाचे मोर, पशु-पक्षी चहकें,

जो रंगे प्रेम के रंग,

हर्ष उल्लास सदा उनके संग,

जिन्होंने निभाई प्रेम की रीत,

उन्हें ही मिला है मन का मीत,

प्रेम का रस है जो पीता,

सही अर्थों में वही है जीता,

प्रेम की तान को जो छेड़ा,

सीधा हो गया जीवन टेड़ा,

प्रेम सुधा ही वैमनस्य का तोड़,

यही है हर खंडन का जोड़,

प्रेम डोर से प्रभु खिंचे चले आते,

साधक प्रेम से ईश्वर-तत्व को पाते,

प्रेम की बंसी जिन्होंने बजाई,

प्रेम की अलख जिन्होंने जगाई ,

उन्होंने ही रोका हर संहार,

उन्होंने ही पाया जीवन सार,

प्रेम में ही है वह शक्ति अपार,

जिससे उद्धृत होगा संसार!

अरुण भगत

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महक उठते उनसे वन-उपवन

जो स्वयं से नहीं हारे,

उन्हीं के वारे-न्यारे,

वही हैं ईश्वर को प्यारे,

जिनके पास संतोष का धन,

नियंत्रण में हैं जिनके मन,

वही तो हैं अमूल्य जन,

तेजोमय जिनका ललाट,

मस्तक के खुले जिनके कपाट,

मार्ग होगा उन्हीं का सपाट,

साहस से जो आगे बढ़ते,

वीर बन परिस्थितियों से लड़ते,

झंडे उन्हीं के हैं गढ़ते,

प्रेम रस को जो पीते,

ह्रदय उनके न होते रीते,

सही अर्थों में वही हैं जीते,

किसी बाधा से जो न डरते,

जीवन में सुंदर रंग वे भरते,

पर- मार्ग प्रशस्त वे करते,

न हों केवल उजले तन,

अपितु निर्मल जिनके मन,

महक उठते उनसे वन-उपवन!

अरुण भगत

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