देख तेरा दफन ज़मीर कहीं फिर न जी जाए

न बोल सच वरना रुसवाई होगी उसूलों की बात पे जग हसाई होगी बेगैरत दुनिया में न कर ग़ैरत की बात  कौन जाने है यहाँ पाक दामन  की जात अपने अख़लाक़ को कहीं कर आ दफन ओढ़ा दे ज़मीर को अपने हाथ से कफ़न झूठ सच का जहां हर फ़र्क़ खतम हो गया वो माशराContinue reading “देख तेरा दफन ज़मीर कहीं फिर न जी जाए”

A Few Self-Composed Lines on Saskatchewan( Canada), The Land of the Living Skies

It is a wonderful land- the land of the living skies Aptly described and proudly proclaimed from car number plates. It is a land where skies are alive from early morn till late evening, Beckoning you with their seductive blue- it is surely a blue to die for-, Or with translucent snow-white clouds floating by,Continue reading “A Few Self-Composed Lines on Saskatchewan( Canada), The Land of the Living Skies”

यहीं से होता सबल सार्थक जीवन प्रारंभ

वक़्त कब किसके हाथ में आता है कब ये अनभिज्ञ का साथ निभाता है? इसका वेग सब कुछ बहा ले जाता है काल चक्र के आगे कौन टिक पाता है? समय की तलवार की तीखी है धार कौन सह पाया है इसका प्रबल वार? समय रहते जिसने जाना है मूल्य समय का सफलता का उज्जवलContinue reading “यहीं से होता सबल सार्थक जीवन प्रारंभ”

न जाने क्यों दिल उदास रहता है

न जाने क्यों दिल उदास रहता है कोई तो ग़म है जो मेरे पास रहता हैं कोई तो ख़लिश है जो सोने नहीं देती बहुत क़रीब किसी के होने नहीं देती कोई फ़िक्र खाए जाती है घुन की तरह दिल चीरती इक मायूस धुन की तरह कोई तो भारी पत्थर है मेरी रूह पर जोContinue reading “न जाने क्यों दिल उदास रहता है”

तुम चले चलो, तुम बढ़े चलो

चाहे मार्ग में फूल खिले हों या फिर मानो शूल बिछे हों, चाहे आकाश में बिजली कौंधे या फिर कोई सपनों को रौंदे, तुम चले चलो, तुम बढ़े चलो! जीवन नहीं रुकने का नाम, हताशा का नहीं कोई काम, बनो नदी की अविरल धार, होगा अवश्यमेव बेड़ा पार, तुम चले चलो, तुम बढ़े चलो! अजबContinue reading “तुम चले चलो, तुम बढ़े चलो”

क्यों चाहते हो बोल कर समझाना

क्यों चाहते हो बोल कर समझाना कहीं बेहतर होगा ख़ामोश रह जाना किसे समझाओगे क्या समझाओगे आख़िर इस जद्दोजहद से क्या पाओगे बहस और तक़रीर से किसी ने क्या पाया ना करो समझने-समझाने में ख़ुद को ज़ाया अपनी राह पकड़ो और ख़ुद से बात करो अपने अंदर के शैतानों से दो-दो हाथ करो अगर नेकContinue reading “क्यों चाहते हो बोल कर समझाना”

उठ, तुझे विवेक पुकारता

पर अपने तू खोल बुलंद कर अपने बोल, समय की है यह माँग झूठी मर्यादाओं को लांघ, फ़रेब का चहूँ ओर है दंश न उसके गहरे जाल में फँस, भीतर के सत्य को दे बल निष्ठा से जी ले हर पल, सच्च के साथ जो खड़ा वही तो है शूरवीर बड़ा, आत्मा न दांव परContinue reading “उठ, तुझे विवेक पुकारता”

अंधी दौड़ है ज़ारी

सब व्यस्त हैं करने में अपनी कथा कौन जाने किसी के मन की व्यथा तूती अपनी बजाने में सब ऐसे मस्त किसे चिंता कौन आहत है, कौन पस्त अपने राग आलापने में सब यूँ हैं मग्न किसे दिखे मानवता होती निर्वसन नग्न हर कोई स्वनिर्मित छद्मजाल में खोया स्वार्थ का घातक विषैला बीज है बोयाContinue reading “अंधी दौड़ है ज़ारी”

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