देख तेरा दफन ज़मीर कहीं फिर न जी जाए

न बोल सच वरना रुसवाई होगी

उसूलों की बात पे जग हसाई होगी

बेगैरत दुनिया में न कर ग़ैरत की बात 

कौन जाने है यहाँ पाक दामन  की जात

अपने अख़लाक़ को कहीं कर आ दफन

ओढ़ा दे ज़मीर को अपने हाथ से कफ़न

झूठ सच का जहां हर फ़र्क़ खतम हो गया

वो माशरा आज भी गया और कल भी गया

वहशतों का जहां उठ रहा है हर तरफ़ ग़ुबार

दबकर ही रह जाएगी वहाँ ज़िहानत की पुकार

देख तेरा दफन ज़मीर कहीं फिर न जी जाए

ज़िंदा हो जाए दुबारा नाहक अज़ीयत  पाए

अरुण भगत

सर्वाधिकार सुरक्षित

Published by Arun Bhagat

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