सृष्टि में प्रेम से बड़ी कोई सकारात्मक शक्ति और ऊर्जा नहीं है, प्रकृति का हर स्पंदन प्रेम से अभिप्रेरित और संचालित है, इसलिए आज  के दिन प्यार को समर्पित एक छोटी सी कविता 

प्यार है तो जहां है सारी ख़ुशी भी वहाँ हैं  प्यार है तो मीठे सपने  और लगते हैं सब अपने  प्यार है तो है असल पूजा  फिर रब अपना,नहीं वो दूजा  प्यार में जब फैलती  हैं बाहें  तो खुल जाती हैं सब बंद राहें  प्यार है जब जब बोलता  दिलों के दरवाज़े खोलता  जब प्यारContinue reading “सृष्टि में प्रेम से बड़ी कोई सकारात्मक शक्ति और ऊर्जा नहीं है, प्रकृति का हर स्पंदन प्रेम से अभिप्रेरित और संचालित है, इसलिए आज  के दिन प्यार को समर्पित एक छोटी सी कविता “

दिल को दिल की राह होती है

दिल को दिल की राह होती है  सब को प्यार की चाह होती है  दिल ही दिल की भाषा जाने  प्रेम से ऊपर वह कुछ न माने  दिल न हो तो दुनिया सूनी  जैसे विशाल ऊसर मरुभूमि  दिल ही तो है जो रिश्ते सींचता  जन को जन की ओर खींचता  दिल की भाषा सुमधुर औरContinue reading “दिल को दिल की राह होती है”

बांह पसार ऐसे जन को मिलिए

वे लोग अच्छे होते हैं  जो मन से बच्चे होते हैं  मन को यूँ भा जाते हैं  क्योंकि वे सच्चे होते हैं  इस कपटी दुनिया में  जो रह पाते हैं अबोध  वही जन ईश्वर को भाते  उन्हें है जीवनामृत का बोध  जो हैं सरल हृदय निष्पाप  छूता उन्हें न कोई संताप  जिस अनुकंपा को जगContinue reading “बांह पसार ऐसे जन को मिलिए”

नए साल की हो नई रीत

एक साल और बीता  कुछ खट्टा कुछ मीठा  कुछ रह गया रीता  कुछ ख्वाहिशें हुईं पूरी  कुछ रह ही गईं अधूरी  टूटे कुछ  सजीले सपने पराए हो गए जो थे अपने  कोई राह जाते पिछड़ गया   कोई जग छोड़  बिछड़ गया  जहाँ कुछ  नए रिश्ते मिले  पुरानों को खा गए गिले  जंगों के रह-रह शोलेContinue reading “नए साल की हो नई रीत”

मुझे गिला नहीं …

मुझे गिला नहीं कि तूँ बिछड़ गया  टीस ये है तूँ मेरा कभी था ही नहीं मैं जानता था की सच का रस्ता होगा दुश्वार  मगर तूँ उस राह का मुसाफ़िर कभी था ही नहीं  लगता  था मंज़िल-ए – मुक़्क़दस तेरे कदम चूमेगी  मगर तूँ उस मंज़िल का तलबगार कभी  था ही नहीं सोचता थाContinue reading “मुझे गिला नहीं …”

अंधे युग की टेढ़ी चाल

अंधे युग की अंधी दौड़  आगे दौड़,  पीछे चौड़  अंधे युग की अंधी बातें  सहमे दिन ,काली रातें  अंधे युग की टेढ़ी चाल  रूठे सुर, बिगड़ी ताल अंधे युग की अंधी भूख  गई समझ की डाली सूख  अंधे युग के विकृत बोल  भरे घावों को देते खोल  अंधे युग में झूठ की जीत बन गईContinue reading “अंधे युग की टेढ़ी चाल”

कौन है वो ?

वो कौन है जो बन मेरा मुर्शिद हर घड़ी मुझे राह दिखाता है  पल-पल मेरा हौंसला बढ़ाता है   टेड़े रस्तों पे भी फ़ख़्र से चलाता है  कौन है जो गहरी उदास शामों को  जला उम्मीद की शमा रौशन बनाता है  बैचैन बे-करार लम्हों में मुझे  सकूँ और चैन की नींद सुलाता है  कौन है जोContinue reading “कौन है वो ?”

बाकी तो सब है इक झूठा फ़साना

क्या छिन गया तुम्हारा  जो उदास हो  क्या लाये थे साथ  जो हताश हो  खाली हाथ आए  खाली हाथ जाना फिर क्यों बेवजह  बुनते  हो ख्वाहिशों का ताना बाना  काहे की रंजिश  काहे का वैर  कौन है अपना  कौन है ग़ैर  कुछ देर के मुसाफ़िर जाना है कहीं दूर जहाँ सुरमई शामों में  बसता हैContinue reading “बाकी तो सब है इक झूठा फ़साना”

के ख़ाक है ये

“You are dust and to dust you shall return.” के ख़ाक है ये  ख़ाक में मिल जाएगी फिर कोई और रूप धर स्वाँग ये रचाएगी फिर शुरू होगी दौड़-धूप फिर वही धूप-छाँव फिर वही कश्मकश फिर वही शहर- गाँव  यूहीं चलेंगे ये सिलसिले कहाँ इसका सुराग मिले कौन रह रह के नचा रहा हमें दुनियावीContinue reading “के ख़ाक है ये”

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