नए साल की हो नई रीत

एक साल और बीता 

कुछ खट्टा कुछ मीठा 

कुछ रह गया रीता 

कुछ ख्वाहिशें हुईं पूरी 

कुछ रह ही गईं अधूरी 

टूटे कुछ  सजीले सपने

पराए हो गए जो थे अपने 

कोई राह जाते पिछड़ गया 

 कोई जग छोड़  बिछड़ गया 

जहाँ कुछ  नए रिश्ते मिले 

पुरानों को खा गए गिले 

जंगों के रह-रह शोले भड़के

 परवान चढ़े  कितने लड़ के 

कितने नफ़रत की भेंट चढ़े 

उखड़े कितने जो मुर्दा थे गड़े 

हुक्मरानों ने फिर खेले खेल

तुम्हारी हमारी बन गई रेल 

बढ़ गई कितनी धक्का-पेल 

कैसा अजब हो रहा ये खेल 

धुएँ के बादल हो गए अति गहरे 

लग गए प्रदूषण के कड़े पहरे 

तकनीक जो सिर चढ़ है बोली

मानव ने तो मानवता ही  खो ली 

कहीं पैसा पानी सरीखे बरसा

तो कोई रोटी के लिए है तरसा 

गए साल की अजब थी चाल 

देखें क्या लाता है  नया साल 

नए साल की हो नई रीत 

जग में बढ़े सद्भाव और प्रीत 

नए गीत हों और नई उमंग

प्रेम सम्भाव की उठे तरंग 

 जीवन को मिले नई दिशा 

नई भोर हो, छट जाए निशा! 

अरुण भगत

सर्वाधिकार सुरक्षित

* क्योंकि अब नव वर्ष दस्तक दे रहा है , आप सब को आगामी वर्ष और आने वाले सभी वर्षों के लिए ढेरों शुभकामनाएँ! आप सब का जीवन प्रत्येक दृष्टिकोण से सुखद और मंगलमय हो! उच्च विचार, सुंदर भावनाएँ और सुकर्म आपके जीवन को सुशोभित करें! आप सब स्वस्थ रहें, आनंद में रहें, इस बहुमूल्य जीवन को सार्थक बनायें और हम सब  मिलकर ईश्वर की असीम कृपा से एक सुंदर संसार का निर्माण करें !

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Published by Arun Bhagat

I love to talk through my writings.@

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