जीने का ये गुर ले जान

  भूल जा जो बुरा हुआ  जो हुआ सो हुआ  भूल जा सब ज़्यातियों को  माफ कर दे  साथियों को  भूल जा किसी के वैर को  अपना बना ले हर ग़ैर को  भूल जा जो गुज़र गया  जब तूँ जागे है दिन नया  बीती बात तूँ दे बिसार  मौजूदा लम्हे पे हो निसार  माज़ी कीContinue reading “जीने का ये गुर ले जान”

ज़िंदगी के चौराहे पे खड़ा हूँ

ज़िंदगी के चौराहे पे खड़ा हूँ  असमंजस में पड़ा हूँ  किस रास्ते पे मिलेगा सकून  किस ओर कदम बढ़ाया जाए  कहाँ मिलेगी बहार-ए- वफ़ा कैसे उस फ़िज़ा को पाया जाए  कहाँ पाएँगे चैन-ओ-सबर कोई तो  मुझे बतलाए  कहाँ छटेंगे ये ग़म के बादल  कहाँ खुशनुमा सहर गुनगुनाए  जहाँ बजती हो अमन की बंसी  कोई हाथContinue reading “ज़िंदगी के चौराहे पे खड़ा हूँ”

फिक्र थी तो. . .

फिक्र थी तो कभी पूछते हाल  यूँ न अपनी बेरुख़ी से करते बेहाल  फ़िक्र  थी तो यूँ न बेवजह हो जाते दूर  रहते पास बनते मेरी आँखों का नूर फ़िक्र   थी तो कभी मेरी ओर बढ़ाते हाथ मोहब्बत से मिलते चलते दो कदम साथ  फ़िक्र  थी तो इस रिश्ते को पालते पोसते  न रखतेContinue reading “फिक्र थी तो. . .”

Why are You So Accursed? O beautiful enchanting land , The jewel in our crown,  Why are you so accursed? It makes me wonder whether all beauty is Somehow somewhere  accursed!  You shine and gleam for sometime And then some malevolent force  Casts  an evil eye upon you And, benumbed and dazed, You fall fromContinue reading

ज़िंदगी की कश्मकश

अजीब सी कश्मकश है ज़िंदगी की  आसानी से आदम का दम भी नहीं निकलता  बर्फ के तोदे अब पिघलने लगे हैं मुसलसल  बस इक इंसान का दिल है जो नहीं पिघलता  वो जो लगा है कायनात को समझने में  उस शख़्स  से अपना ही घर नहीं सम्भलता जो बात करता है  दुनिया से लड़ जानेContinue reading “ज़िंदगी की कश्मकश”

कर लिए मोक्ष द्वार बंद !

एक से हम उपजे एक के हम बालक   काहे को भेद हम करते  एक हमारा चालक!  एक से सब शुरू हुआ  एक पे होगा अंत  फिर मत-भेद काहे का  काहे के हैं सब द्वन्द?  क्यों स्वयं को व्यथित करते  क्यों वैमनस्य पालें, क्यों चक्रव्यूह हम रचते  क्यों रचते प्रपंच ?  क्यों किसी को पीड़ा देते Continue reading “कर लिए मोक्ष द्वार बंद !”

सोचता हूँ …

सोचता हूँ कभी कुछ वक्त अपने लिए भी चुरा लूँ , पर वक्त भाग जाता है ज़िंदगी की उलझनों और  उठा-पटक में, आपा-धापी में! सोचता हूँ योजनाबद्ध तरीके से कुछ ठोस, कुछ सृजनात्मक करूँ , पर ज़िन्दगी रोज़ के रोज़  डाल देती है किसी इम्तिहान में , और मैं असमंजस में वक्त को अपने हाथोंContinue reading “सोचता हूँ …”

ज़िंदगी के नायाब तोहफ़े को यूं ना गवायें

ज़िंदगी के नायाब तोहफ़े को यूं ना गवायें  चलो हंसें और किसी और को भी हंसायें  जो गया है गिर उसे पकड़ बांह उठायें  फिर जी उठेगा वो और देगा दुआयें   जो मुफ़लिसी के मारे रोटी को है तरसता क्यों हमारा प्यार उस पर नहीं है बरसता  चलो पकड़ इक दूजे का हाथ आगेContinue reading “ज़िंदगी के नायाब तोहफ़े को यूं ना गवायें”

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