एक से हम उपजे
एक के हम बालक
काहे को भेद हम करते
एक हमारा चालक!
एक से सब शुरू हुआ
एक पे होगा अंत
फिर मत-भेद काहे का
काहे के हैं सब द्वन्द?
क्यों स्वयं को व्यथित करते
क्यों वैमनस्य पालें,
क्यों चक्रव्यूह हम रचते
क्यों रचते प्रपंच ?
क्यों किसी को पीड़ा देते
क्यों होते विचलित
क्यों प्रभु के हम न होते
क्यों खोते परमानंद ?
माया के उन्माद में भूले
स्वभाव हमारा आनंद
मंद बुद्धि से ग्रस्त हम ने
कर लिए मोक्ष द्वार बंद!
अरुण भगत
सर्वाधिकार सुरक्षित
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