सोचता हूँ …

सोचता हूँ कभी कुछ वक्त

अपने लिए भी चुरा लूँ ,

पर वक्त भाग जाता है

ज़िंदगी की उलझनों और 

उठा-पटक में, आपा-धापी में!

सोचता हूँ योजनाबद्ध तरीके से

कुछ ठोस, कुछ सृजनात्मक करूँ ,

पर ज़िन्दगी रोज़ के रोज़ 

डाल देती है किसी इम्तिहान में ,

और मैं असमंजस में वक्त को

अपने हाथों से फिसलते

 देखता रहता हूँ टुकुर-टुकुर!

लगता है यही हमारी नियति है

कि हमारा वक्त पे कोई इख़्तियार 

है ही नहीं, ज़िंदगी पे कोई बस नहीं,

या फिर यह  हमारी इच्छा शक्ति 

और अनुशासन की कमी को 

ढकने की बेचारी सी लाचार 

कोशिश है शायद ! 

अरुण भगत

सर्वाधिकार सुरक्षित

#arunbhagatwrites#poetry# poeticoutpourings#outpouringsof myheart#writer#Indianwriter#englishpoetry#hindipoetry#poetryofthesoul

सोचता हूँ कभी कुछ वक्त

अपने लिए भी चुरा लूँ ,

पर वक्त भाग जाता है

ज़िंदगी की उलझनों और 

उठा-पटक में, आपा-धापी में!

सोचता हूँ योजनाबद्ध तरीके से

कुछ ठोस, कुछ सृजनात्मक करूँ ,

पर ज़िन्दगी रोज़ के रोज़ 

डाल देती है किसी इम्तिहान में ,

और मैं असमंजस में वक्त को

अपने हाथों से फिसलते

 देखता रहता हूँ टुकुर-टुकुर!

लगता है यही हमारी नियति है

कि हमारा वक्त पे कोई इख़्तियार 

है ही नहीं, ज़िंदगी पे कोई बस नहीं,

या फिर यह  हमारी इच्छा शक्ति 

और अनुशासन की कमी को 

ढकने की बेचारी सी लाचार 

कोशिश है शायद ! 

अरुण भगत

सर्वाधिकार सुरक्षित

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Published by Arun Bhagat

I love to talk through my writings.@

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