यह किस तरक़्क़ी का दौर है?

मोहसिन हमारे साथ बड़ा हादसा हुआ, हम रह गये, हमारा ज़माना चला गया The above couplet by Mohsin Naqvi was the trigger for the poem below. कहाँ चला गया वो ज़माना, जब हर कोई था जाना पहचाना, जहां प्यार की तरंगें बहती थीं, जहां दिल में इंसानियत रहती थी, जहां थोड़े में थे सब राज़ी,Continue reading “यह किस तरक़्क़ी का दौर है?”

Never Ever Truth Try to Fudge

Never for long hold a grudge, From your fixed positions learn to budge, Never ever truth try to fudge, Live a life that is clean and green, Never about your transient successes preen, Never let your conscience lose its sheen, Instead of grabbing, learn to give, A simple frugal life strive to live, Let allContinue reading “Never Ever Truth Try to Fudge”

Do Not Let Bitter Memories Your Journey Mar When your travels take you wide and far, Do not let bitter memories your journey mar, Take life as it comes in your stride, Savour the miracles of this world vast and wide, Let the twinkling stars speak to you of wonderous things, Let the soaring oceanContinue reading

ख़ुद को ही समझ बैठे ख़ुदा

देखता हूँ जब किसी का अंधा गुरुर, सोचता हूँ कैसा है यह ज़हरीला सरूर, जिसमें आदमी किसी को आदमी न जाने, हर किसी को वह बौना और गौण माने, ख़ुद को ही समझ बैठे ख़ुदा, और यूँही खुदाई से हो जाए जुदा, कितनों को यह ग़ुरूर है ले डूबा, फिर भी इस नशे से नहींContinue reading “ख़ुद को ही समझ बैठे ख़ुदा”

सुनो उनका गीत आँखें मूँदे

बारिश की जो गिरती बूँदें,सुनो उनका गीत आँखें मूँदे,आकाश से अमृत है बरसे,तृप्त हो धरती जो तरसे,मेह जो बरसें, वरदान मानिए,स्वयं को भाग्यवान जानिए,मेह रूप में प्रभु कृपा है बरसे,धन्य जानिए ख़ुद को मन से,गरजते बादल, मिट्टी सौंधी,मूल्य न जाने खोपड़ी औंधी,घिर-घिर आयें जब मेघ,वर्षा का जब देखो वेग,ह्रदय हो तरंगित, गाओ मल्हार,जानो इसे प्रकृतिContinue reading “सुनो उनका गीत आँखें मूँदे”

तूँ तो सन्मार्ग का पथिक ठहरा

बन उजाला जग को दिखा राह, न हो मन में तेरे कोई और चाह, उठा हर गिरे हुए को बाँह पकड़, उदासीनता की न हो तुझ पे कोई जकड़, बन मरहम हर किसी के घाव का, माँझी बन मँझधार में फँसी हर नाव का, बुझा ज्वाला बन धधकती हर आग को, तज दे हर कटुताContinue reading “तूँ तो सन्मार्ग का पथिक ठहरा”

बिकाऊ नहीं मेरा ज़मीर

मौज लो और रोज़ लो, न मिले तो खोज लो, कोई पल न आएगा दुबारा, यह जान लो और सोच लो, जिस राह पर दुश्वारियाँ बढ़ें, उधर जाते कदम रोक लो, ख़ुशियों का हो जो दिखता रेला, अपनी ओर उसे मोड़ लो, तारों की फैली इस चादर को बढ़ा हाथ तुम ओढ़ लो, बहते दरियाContinue reading “बिकाऊ नहीं मेरा ज़मीर”

शुरू हुई तब उस पार की होली

रंग चढ़े प्रभु नाम का, यह रंग न फीका होवे, जब यह रंग चढ़ चले, और रंग न भावे मोहे, होली खेली जब प्रभु संग, उसके रंग में जब गई रंग, नाम की जब चढ़ी खुमारी, अनन्य भक्तों में जब हुई शुमारी, जीवन का पाया सार, और बेड़ा हो गया पार, प्रभु चरणों की लीContinue reading “शुरू हुई तब उस पार की होली”

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