ज़र्रे-ज़र्रे में मेरे राब की निगाहे करम है,
कौन कहता है, उस पे ज़्यादा और मुझ पे कम है,
चप्पे-चप्पे पे दिखता है उसका नूरी जलाल,
फिर क्यों हो उसको ले मन में कोई शुबहा या मलाल,
हर इक पर बरसती उस रब की रहमत,
क्यों न इसको समझने की करते हम ज़हमत,
क्यों न करते उसकी रहमतों का शुक्र,
क्यों बनाते अपनी ज़िंदगी को मैदान-ए-कुफ़्र,
क्यों उसकी चौखट पे सजदे हम न करते,
क्यों उसके नायाब तोहफ़ों का दम हम न भरते,
क्यों नापाक ख़्वाहिशों की आग में हम हैं जलते,
क्यों उसकी दिखाई नेक राह पे हम न चलते,
क्यों अपनी दग़ाबाज़ियों से मुश्किल बनाते अपने रास्ते,
क्यों नहीं पाक रखते अपना दामन ख़ुदा के वास्ते!
अरुण भगत
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Amazing lines sir💯😇
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Thank you very much, dear! God bless you!
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कमाल लिखा है Arun ji
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धन्यवाद, चीनू जी! कमाल मेरा नहीं, लिखाने वाले का है! सब ख़ुदा की रहमत है!
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Nice Poem sir.
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Thank you very much, Saurabh dear! God bless you!
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Beautiful lines❤️
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Thank you very much, Sahil! Thanks for your lovely feedback to the composition! Stay blessed.
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अति सुंदर! हम सब पर ईश्वर की दया दृष्टि तथा उपकार इतने हैं की उनका बयां करना भी व्यर्थ है। इसलिए हमें हर समय केवल ईश्वर का आभार प्रकट करना चाहिए। इससे हमारा पुर्ण जीवन सकरात्मक हो जायेगा।
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Thank you very much, brother! It is only living in God-consciousness that can lead us to our redemption. The rest is all worldly rigmarole!
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👌👌👌
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Thank you, Ankit Ji! God bless you!
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