थम जा कुछ पहर, खुद का एहतराम कर
अंधी दौड़ में न भाग तूँ, कुछ देर आराम कर,
थम जा कुछ पहर, खुद का एहतराम कर,
दौड़ कर जाएगा कहाँ, कुछ देर तो गौर कर,
अम्बार जो लगा रहा, यहीं जाएगा छोड़ कर,
सोच तो सही ज़रा, कुछ देर इतमीनान कर,
सकूँ से बैठेगा अगर अपने जी को बांध कर,
अमन चैन पा लेगा यहीं, इस बात पर एतबार कर!
कायनात में सब चल रहा ढंग से इक लीक पर,
तूँ भी सलीके से जी ले ज़रा इस बात से कुछ सीख कर!
कुदरत ने बांधी हैं जो हदें, उन्हें न तूँ पार कर,
ग़रूर जब टूटेगा तेरा तो खुद ही बैठ जाएगा थक हार कर!
रहम कर खुद पे, खुद के साथ इंसाफ़ कर,
अंधी दौड़ में न भाग तूँ, कुछ देर आराम कर,
थम जा कुछ पहर, खुद का एहतराम कर!
अरुण भगत
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Wow!great sir👍👍👍
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Thank you, Adsu! Happy that the poem appealed to you.
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सुंदर संदेश👏👏👏👌👌🙏🌻🌻
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बहुत बहुत धन्यवाद, मीनाक्षी मैडम! सब ईश्वर की कृपा है!
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बहुत अच्छी कविता लगी सर
🙏🙏💐💐💐
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धन्यवाद, ममता मैडम! मुझे बहुत अच्छा लगा कि कविता आपको अच्छी लगी! पाठक को अच्छा लगे तभी लेखन सार्थक है!
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Owsm lines sir❤
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धन्यवाद, सपना जी! कविता को सराहने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद!
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Beautiful thoughts captured wonderfully!!!
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Thank you, Neha Ji! What you say and how you say it, both are very important, aren’t they?
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बहुत बढ़िया संदेश
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बहुत बहुत धन्यवाद, प्रियंका जी! संदेश की सार्थकता तभी है जब सुनने पढ़ने वाला उसे आत्मसात् करे!
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Very nice…sir
Insightful and inspirational
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Thank you, Sonia Ji! Both insights and inspiration are important,aren’t they?
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