थम जा कुछ पहर, खुद का एहतराम कर

थम जा कुछ पहर, खुद का एहतराम कर

अंधी दौड़ में न भाग तूँ, कुछ देर आराम कर,

थम जा कुछ पहर, खुद का एहतराम कर,

दौड़ कर जाएगा कहाँ, कुछ देर तो गौर कर,

अम्बार जो लगा रहा, यहीं जाएगा छोड़ कर,

सोच तो सही ज़रा, कुछ देर इतमीनान कर,

सकूँ से बैठेगा अगर अपने जी को बांध कर,

अमन चैन पा लेगा यहीं, इस बात पर एतबार कर!

कायनात में सब चल रहा ढंग से इक लीक पर,

तूँ भी सलीके से जी ले ज़रा इस बात से कुछ सीख कर!

कुदरत ने बांधी हैं जो हदें, उन्हें न तूँ पार कर,

ग़रूर जब टूटेगा तेरा तो खुद ही बैठ जाएगा थक हार कर!

रहम कर खुद पे, खुद के साथ इंसाफ़ कर,

अंधी दौड़ में न भाग तूँ, कुछ देर आराम कर,

थम जा कुछ पहर, खुद का एहतराम कर!

अरुण भगत

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Published by Arun Bhagat

I love to talk through my writings.@

14 thoughts on “थम जा कुछ पहर, खुद का एहतराम कर

    1. धन्यवाद, ममता मैडम! मुझे बहुत अच्छा लगा कि कविता आपको अच्छी लगी! पाठक को अच्छा लगे तभी लेखन सार्थक है!

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद, प्रियंका जी! संदेश की सार्थकता तभी है जब सुनने पढ़ने वाला उसे आत्मसात् करे!

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