कहाँ लुप्त हो गए…

कहाँ लुप्त हुए वो अमन चैन के दिन, जब जीवन की न कर सकते थे परिकल्पना प्रेम बिन, जब जीवन लगता था सारगर्भित, जब सनेह के पुष्प होते थे पल्लवित, जब मन में उठती थी उल्लास की तरंग मानो आकाश में झूमती नाचती मस्त कोई पतंग, सादा जीवन, प्रगाढ़ सम्बंध, सुंदर गीत, बिना जीत केContinue reading “कहाँ लुप्त हो गए…”

सब कुछ ख़ुदा पे छोड़ दे

मन में यह मलाल क्यों, चेहरे पे ये सवाल क्यों, कहाँ मिलेंगे तुझे जवाब, होता है हलकान क्यों? जान ले तू यह आज, यहाँ राज़ में हैं दफ़न राज़, कहाँ परतों को तू हटाएगा, इसी तिलस्मी जाल में उलझ जाएगा, न खड़े कर इतने सवाल, न बन जा खुद ही अपने जी का जंजाल, डालContinue reading “सब कुछ ख़ुदा पे छोड़ दे”

स्वयं को करो सिद्ध

चलो उठो, हाथ बढ़ा कर छू लो, यह विस्तृत गगन तुम्हारा है, इसी सोच ने बहुतेरों का जीवन संवारा है, चलो, हो जाओ लहरों पर सवार, दिखता है दूर जो क्षितिज, वह भी तो तुम्हारा है, आगे बढ़ने वालों को रुकना कहाँ गवारा है? चंद्रमा के घोड़े पे सवार बढ़ जाओ तारों की ओर, कौनContinue reading “स्वयं को करो सिद्ध”

This Culture of High Rises But Low Life

Today’s soulless culture Nibbles at your soul like a vulture, It saps your energy Because its mindlessness with your inner being has no synergy, With lust as its creed, It promotes unabashed greed, Armed with its project of dumbing down your mind, It is certainly one of its kind, Your sense you have to pawnContinue reading “This Culture of High Rises But Low Life”

अजीब सी यह एक पहेली है

ज़िंदगी की क्या ग़ज़ब कहानी है, कभी सब कुछ जाता थम, कभी लगे रगों में रवानी है, अजीब सी यह एक पहेली है, कभी दुश्मन, कभी लगे सहेली है, कभी बैठाए सिर पर, कभी नीचे पटकती है, कभी सजे काजल की तरह आँखों में, कभी कंकड़ की तरह अटकती है, कभी लहलहाते खेतों की तरह,Continue reading “अजीब सी यह एक पहेली है”

जग में है माँ जैसा कौन?

जग में माँ जैसा है कौन, सब बोलती वह रह कर मौन, जो बन पाता सब कुछ करती, बच्चों के लिए वह जीती मरती, वह तो है एक अमूल्य निधि, कर मिटने की वह जाने विधि, माँ के हाथ से जो हम खाएँ, उसका ऋण हम कहाँ से चुकाएँ ? माँ है धरती पर उतराContinue reading “जग में है माँ जैसा कौन?”

साथ ही मन उपवन महकें

विषमताओं से हम साथ लड़ें हर कसौटी पर उतरें खरे, साथ ही खिलें सबके मन, साथ ही चलें सब जन, साथ ही मन उपवन महकें, सदा जहां प्रेम कोकिला चहके, साथ ही बुनें सामाजिक ताना बाना, साथ ही बैठना, साथ ही खाना, साथ ही करें राष्ट्र निर्माण, बनें राष्ट्र गौरव, साथ ही हों उदीयमान, साथContinue reading “साथ ही मन उपवन महकें”

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