आख़िर कौन है वो?

कौन है जो प्यार के दो मीठे बोल बोलेगा ज़ख्मों पर लगाएगा मरहम, मन की गिरहें खोलेगा कौन है जो जान अपना अंतर्मन में झांकेगा कौन है जो मेरे एहसासों की सही क़ीमत को आंकेगा कौन है जो मोहब्बत से सहलाएगा मेरा मस्तक और मुद्दत से बंद दिल के दरवाज़ों पर देगा दस्तक कौन हैContinue reading “आख़िर कौन है वो?”

Look at This Season Spreading Its Ever So Luminous Wings

Look at the spring in all its glory How it tells its joyous and vibrant story! How it makes the whole earth come alive How a thousand dreams does it launch and drive How every blooming flower becomes a ray of hope How it exhorts you not to brood or mope How nature on itsContinue reading “Look at This Season Spreading Its Ever So Luminous Wings”

सफल होगा दुर्लभ जीवन तेरा

मन, तू हिम्मत न हार अपने भय पर कर प्रहार हो जाएगा बेड़ा पार निर्भयता की जोत जला टल जाएगी हर एक बला आत्मविश्वास का बना सेतु कुछ न कर पाएँगे राहु-केतु दृढ़ निश्चय कर बढ़ जा आगे देख कैसे सब संशय भागें तेरे घट में बैठे प्रभु राम रमा ले मन में उनका नामContinue reading “सफल होगा दुर्लभ जीवन तेरा”

होंगे तुम्हारे ये धरा और गगन

निर्भय हो आगे बढ़ो सत्य सीढ़ी पर चढ़ो निष्ठा को बनाओ ढाल असत्य का बेंधो हर जाल अहंकार पर करो प्रहार स्वार्थ न हो सर पर सवार कायर बन न हर दिन मरो न अकारण ही तुम डरो ज्ञान का दीपक जलाओ जीवन को सार्थक बनाओ बलिष्ठ बनो और बनो समर्थ अमूल्य जीवन न होContinue reading “होंगे तुम्हारे ये धरा और गगन”

दोस्त, फ़ुरसत में कभी आना तुम

दोस्त, फ़ुरसत में कभी आना तुम सकूँ भरे लम्हे साथ लाना तुम इत्मीनान से बातें दो-चार करेंगे ज़िंदगी के कैनवस में नए रंग भरेंगे पुरानी मीठी यादें ताज़ा करेंगे मिल बैठ उनमें इक नई रूह भरेंगे ठंडे पड़ गए रिश्तों में फूँकेंगे नई जान मिल जाए जैसे हीरों की कोई ख़ान आबाद करेंगे फिर दिलContinue reading “दोस्त, फ़ुरसत में कभी आना तुम”

शून्य और शून्य के बीच

जीवन एक छोटा सा अंतराल ही तो है शून्य और शून्य के बीच, शाश्वत मौन और मौन के बीच, फिर इसको लेकर इतना कोहराम क्यों, कोलाहल क्यों ? कहाँ ले जाएगी यह सरपट दौड़, क्या पा लेंगे, क्या पास रह जाएगा, क्यों चिंता हैं खोने की जब अपना कुछ है ही नहीं ? जब कुछContinue reading “शून्य और शून्य के बीच”

क्यों?

ख़ाली हाथ आए, ख़ाली हाथ जाना, भाग मृगतृष्णाओं के पीछे कुछ नहीं है पाना, अटल सत्य से हम सब दूर भागते, रहते सोए, कभी न जागते, भ्रम में जीते, भ्रम में मरते, आलिंगन सत्य का कभी न करते, यूहीं दौड़ती विकारों की गाड़ी, यूहीं उलझाती अज्ञानता की बाढ़ी, यूहीं मद सिर चढ़ कर बोलता, पटContinue reading “क्यों?”

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