उठ, तुझे विवेक पुकारता

पर अपने तू खोल बुलंद कर अपने बोल, समय की है यह माँग झूठी मर्यादाओं को लांघ, फ़रेब का चहूँ ओर है दंश न उसके गहरे जाल में फँस, भीतर के सत्य को दे बल निष्ठा से जी ले हर पल, सच्च के साथ जो खड़ा वही तो है शूरवीर बड़ा, आत्मा न दांव परContinue reading “उठ, तुझे विवेक पुकारता”

अंधी दौड़ है ज़ारी

सब व्यस्त हैं करने में अपनी कथा कौन जाने किसी के मन की व्यथा तूती अपनी बजाने में सब ऐसे मस्त किसे चिंता कौन आहत है, कौन पस्त अपने राग आलापने में सब यूँ हैं मग्न किसे दिखे मानवता होती निर्वसन नग्न हर कोई स्वनिर्मित छद्मजाल में खोया स्वार्थ का घातक विषैला बीज है बोयाContinue reading “अंधी दौड़ है ज़ारी”

देखो मन कहाँ भागा जा रहा है

देखो मन कहाँ भागा जा रहा है, इच्छाओं और तृष्णाओं के पीछे, दिखाने के लिए औरों को नीचे, दुनिया की चका-चौंध से भ्रमित, असीमित विषय-वासनाओं से ग्रसित, खींच रहा है हमें विनाश की ओर, जहां न दूर तक दिखती कोई भोर, स्वयं तो गर्त में जा ही रहा है, हमारे सुख-चैन को भी खा रहाContinue reading “देखो मन कहाँ भागा जा रहा है”

ख़ुद ही ख़ुद का दोस्त आला है

ख़ुद ही को ख़ुद का हमदर्द पाया और कहाँ है जहां में कोई हमसाया ख़ुद ने ख़ुद से मीठी ज़ुबान बोली ख़ुद ने ही ख़ुद की गिरह खोली ख़ुद ही ने ख़ुद को सम्हाला है ख़ुद ही ख़ुद का दोस्त आला है ख़ुद ही ने की ख़ुद के लिए ज़हमत ख़ुद ही ने ख़ुद परContinue reading “ख़ुद ही ख़ुद का दोस्त आला है”

हर दौर में मोहब्बत का पैग़ाम सुनाना चाहिए

ज़िंदगी जीने का कोई बहाना चाहिए इक खूबसूरत ख़्वाब, दिलकश अफ़साना चाहिए दूर तक फैली इस सहरा की रेत पे रूह को तर कर दे वो तराना चाहिए कौन जाने है आज किसी के दर्द को हमदर्द था जो दोस्त पुराना चाहिए नागवार ख़ुदपरस्ती से न कुछ भी होगा हासिल हर दौर में मोहब्बत काContinue reading “हर दौर में मोहब्बत का पैग़ाम सुनाना चाहिए”

रूह में जो उतर जाएं खूबसूरत रंग

तवज्जो दीजिए इस बात पे, करिए गौर हर बेरंग ज़िंदगी हो रंगों से सराबोर हर बस्ती में बिखरें ख़ुशनुमा रंग ऐसा हो हमारा सलीका, ऐसे ढंग आसमां में बिछती रोज़ रंगों की बिसात ऐसा ही हो ज़मीं पे, पाएँ ग़मों से निज़ात रूह में जो उतर जाएं खूबसूरत रंग मिट जाए हर बदसूरती, ख़त्म होContinue reading “रूह में जो उतर जाएं खूबसूरत रंग”

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