वजूद में उनके साये गहरे

मुखौटों के पीछे छिपे लोग न जाने पालें कितने रोग बनावट की ज़िंदगी जिएँ झूठ का रोज़ प्याला पिएँ सच्च से रहते कोसों दूर उनकी ज़िंदगी में कहाँ कोई नूर कहाँ ख़ुशी कहाँ है चैन जीवन उनका एक लंबी रैन ज़मीर पे लगाएँ चाहे लाखों पहरे वजूद में उनके साये गहरे मुखौटों की भीड़ मेंContinue reading “वजूद में उनके साये गहरे”

जब जाए तो चैन से जाए

डर-डरके क्यों जीता है ज़हर ख़ौफ़ का क्यों पीता है तय है इक दिन तो मरना फिर घड़ा पाप का क्यों भरना ज़िंदगी तो है इक सपना यहाँ नहीं है कोई अपना फिर नेह क्यों लगाता है ख्याली पुलाव पकाता है क्यों फँसता किसी फंदे में क्या रखा गोरखधंधे में कुछ देर का ही यहाँContinue reading “जब जाए तो चैन से जाए”

माँ तो आख़िर माँ है

माँ तो आख़िर माँ है, अपने बच्चों में उसकी जाँ है, बच्चे होते टुकड़े माँ के जिगर के, वो है बसती उनकी नस-नस में, माँ है तो सारा जहां है, जहां माँ, जन्नत वहाँ है, माँ ने है बच्चों को ज़ाया, उनके लिए है वो घना साया, राहत दे माँ की पुकार, जैसे गर्मी मेंContinue reading “माँ तो आख़िर माँ है”

क्या आदमी था वो क्या आदमी था वो, सच के लिए लड़ मर सकता था, सौ झूठों पे भारी पड़ सकता था, क्या आदमी था वो, कितने उसकी साफ़गोई का दम भरते थे, उसकी पाकीज़गी पे मरते थे, क्या आदमी था वो, सारी कायनात से प्यार करता था, ज़ुल्मो-जब्र के ख़िलाफ़ लड़ता था, क्या आदमीContinue reading

प्रेम में है वह शक्ति अपार

कितनी सुंदर प्रेम की भाषा, संचरित करती उमंग और आशा, प्रेम से वन- उपवन महकें, नाचे मोर, पशु-पक्षी चहकें, जो रंगे प्रेम के रंग, हर्ष उल्लास सदा उनके संग, जिन्होंने निभाई प्रेम की रीत, उन्हें ही मिला है मन का मीत, प्रेम का रस है जो पीता, सही अर्थों में वही है जीता, प्रेम कीContinue reading “प्रेम में है वह शक्ति अपार”

महक उठते उनसे वन-उपवन

जो स्वयं से नहीं हारे, उन्हीं के वारे-न्यारे, वही हैं ईश्वर को प्यारे, जिनके पास संतोष का धन, नियंत्रण में हैं जिनके मन, वही तो हैं अमूल्य जन, तेजोमय जिनका ललाट, मस्तक के खुले जिनके कपाट, मार्ग होगा उन्हीं का सपाट, साहस से जो आगे बढ़ते, वीर बन परिस्थितियों से लड़ते, झंडे उन्हीं के हैंContinue reading “महक उठते उनसे वन-उपवन”

नयी अरुणायी है गर्भ में लाती हर निशा

जो बीत गया सो बीत गया, काहे को तूँ उदास भया, हर बेला नूतन, नया हर पल, नए क्षितिज होंगे सामने कल, नया होगा अंबर, नए होंगे तारे, नए-नए मिलेंगे अवसर सारे, नए होंगे सोपान, नए आयाम, बढ़ आगे, तज सब विश्राम, देख तुझे बुलाते नए गंतव्य, समझ भाग्य का तूँ मंतव्य, बढ़ आगे सबContinue reading “नयी अरुणायी है गर्भ में लाती हर निशा”

यह किस तरक़्क़ी का दौर है?

मोहसिन हमारे साथ बड़ा हादसा हुआ, हम रह गये, हमारा ज़माना चला गया The above couplet by Mohsin Naqvi was the trigger for the poem below. कहाँ चला गया वो ज़माना, जब हर कोई था जाना पहचाना, जहां प्यार की तरंगें बहती थीं, जहां दिल में इंसानियत रहती थी, जहां थोड़े में थे सब राज़ी,Continue reading “यह किस तरक़्क़ी का दौर है?”

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