ए ख़ुदा, रहम कर

ग़ुरूर के चलते सजदे में सर झुकाना भूल जाता हूँ ख़ुद को तेरी पाक मोहब्बत के काबिल बनाना भूल जाता हूँ भूल जाता हूँ तेरी रहमतों का शुकर करना भूल जाता हूँ नहीं चाहिए मुझे अपनी सलाहियतों का दम भरना भूल जाता हूँ कि मैं तो तेरे कदमों की ख़ाक हूँ वक़्त के कदमों मेंContinue reading “ए ख़ुदा, रहम कर”

कितने प्रश्न मुँह बायें खड़े हैं

कितने प्रश्न मुँह बायें खड़े हैं उत्तर की माँग पर अड़े हैं, ये सवाल वाक़ई हैं बहुत ढीठ, न मोड़ सकते तुम उनसे पीठ, सही-ग़लत न्याय-अन्याय की पूछते बात, न ये देखें दिन और न ही देखें रात, अनंत काल से ये यूँ ही अचल अडिग खड़े हैं, इनको हल करते-करते हम कितने विवादों मेंContinue reading “कितने प्रश्न मुँह बायें खड़े हैं”

इंसानियत को ग़र दिया गंवा

इंसानी क़दरों का पतन न सह सकता कोई वतन इन क़दरों को जो खो दिया मानो विनाश का बीज बो दिया भूल गए सही ग़लत का फ़रक तो समझो हो गए हम गरक बर्बादियों के रस्ते खुल जाएँगे फिर कहाँ चैन हम पाएँगे इंसानियत को ग़र दिया गंवा सारी तरक़्क़ी हो जाएगी हवा जब ग़ैरतContinue reading “इंसानियत को ग़र दिया गंवा”

कैसी ये वहशत है

कैसी ये वहशत है फ़िज़ाओं में भी दहशत है दहकते अँगारे हैं आज ज़ुबानों पर लगा पाया कौन पहरे बदगुमानों पर उल्फ़त पर भी लग गए पहरे न जाने ये दौर जा कहाँ ठहरे दुआओं में भी जब नहीं रहा असर इस माशरे में अब कैसे हो बसर दरकते पहाड़ भी कुछ बोल रहे हमारीContinue reading “कैसी ये वहशत है”

चाँद पर पहुँचा चंद्रयान

चाँद पर पहुँचा चंद्रयान , क्यों न हो हमें अभिमान, चाँद पर तिरंगा लहराये, क्यों न हर्ष से मन भर आए, क्यों न अपने वैज्ञानिकों पर करें अभिमान, राष्ट गौरव का वो बने हैं यान, साइंसदान महिलाओं ने हैं दिखाए जौहर, महिला शक्ति पर लगा दी अपनी मोहर, देश ने एक नया आयाम पार कियाContinue reading “चाँद पर पहुँचा चंद्रयान”

स्व से होता सब शुरू

कर भला तो हो भला, टल जाएगी सब बला, सर्व का कल्याण कर, फिर किस बात का डर, बना अच्छाई को अपनी ढाल, फिर न होगा बाँका बाल, चर -अचर में प्रभु को देख, न निकाल कोई मीन-मेख, विधि का है जो लेख, उसमें प्रभु अनुकंपा देख, तत्व ज्ञान की बन जा ख़ान, सर्व जगतContinue reading “स्व से होता सब शुरू”

हम निकल आए हैं इतना आगे और इतनी दूर

ज़मीन धँस रही है, इमारतें ढह रही हैं, बारिशें क़हर ढा रही हैं, नदियाँ उफान पे हैं, हर चीज़ उनमें बह रही है, पहाड़ हिल गए हैं, मानो ये सब मिल गये हैं, जंगलों की भीषण आग छेड़ रही है डरावने राग, ये धंसते पहाड़, यह मिट्टी में मिलती इमारतें और उनमें दब गई चीखें,Continue reading “हम निकल आए हैं इतना आगे और इतनी दूर”

Design a site like this with WordPress.com
Get started