अधूरी ज़िंदगी भी क्या ज़िंदगी !
अधूरे सपने, अधूरी ख्वाहिशें ,
अधूरी चाहतें , अधूरे रिश्ते ,
अधपकी सोच, आधा सा वजूद ,
दबा सा जोश , ज़रा सा होश ,
सिमटे सकुचाते से एहसास,
पास हो कर भी न हो कोई पास ,
पर कटे असूल, क्या हो उनसे वसूल?
मानो अधर में लटके तृशंकु जैसी
हो हमारी नियति
जिसमे कुछ भी न हो पूरा,
बस सब आधा-आधा !
अरुण भगत
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